आखिरकार ये सब क्या हो रहा है
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। अदालत के आदेश पर दर्ज एफआईआर में आरोप है कि शंकराचार्य ने दो बच्चों के साथ यौन शोषण किया। अदालत के आदेश पर मुकदमा दर्ज हो गया है। मुकदमा पोक्सो एक्ट में दर्ज हुआ है। इसमें बिना वारंट गिरफ्तारी का प्रावधान है। मुकदमा लिखवाने वाले आशुतोष ब्रह्मïचारी हैं। ये खुद एक हिस्ट्रीशीटर हैं, इनके खिलाफ दर्जनों मुकदमे दर्ज है और थाने में हिस्ट्रीशीट खुली हुई है। ये एक बहुत बड़े महाराज के शिष्य बताये जाते हैं। अब शंकराचार्य को पुलिस गिरफ्तार करेगी या नहीं करेगी ये बड़ा सवाल है लेकिन शंकराचार्य के खिलाफ जो मुकदमा लिखवाया गया है वो सही या गलत है ये जांच का विषय है लेकिन जो टाइमिंग बताई गई है। उस पर सवाल खड़े होने लगे हैं। अब पूरी तरह से लड़ाई भगवा बनाम भगवा हो गई है। २0२७ के विधानसभा चुनाव से पहले भगवा बनाम भगवा की लड़ाई बहुत कुछ गुल खिलायेगी इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। एक पुराने मामले में मुकदमा दर्ज कराना ये भी अपने आप में सवाल खड़ा करता है। जिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के चरण देश के प्रधानमंत्री छूते हों आखिरकार उनसे अब इतनी नफरत क्यों हो गई है। जिस तरह के शब्द सोशल मीडिया पर उनके बारे में चले रहे हैं वो कहां तक सही है। एक शंकराचार्य को कुकर्मी कहना कालनेमी कहना ये कहां तक उचित है। अभी मुकदमा दर्ज हुआ है, जांच होगी दूध का दूध पानी का पानी होगा। यदि वास्तव में इसमें कोई सच्चाई होगी, अदालत से सजा मिलेगी और वो कुकर्मी घोषित होंगे तब आप सार्वजनिक तौर पर कुर्मी कह सकते हैं। लेकिन अभी आरोप ही लगे हैं दोष सिद्घ नहीं हुआ है। उत्तर प्रदेश में ये भगवा बनाम भगवा की लड़ाई किसके कहने पर चल रही है ये बड़ा सवाल है। आखिरकार ऐसा क्या हो गया जब एक शंकराचार्य के खिलाफ इस तरह का माहौल रातोंरात बना दिया गया। अब शंकराचार्य को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति एकदम गरमा गई है। शंकराचार्य भी खुलकर अब अपना पक्ष रख रहे हैं। उनका कहना है कि उनके खिलाफ जिसने शिकायत लिखवाई है उसके खिलाफ दर्जनों मुकदमे दर्ज हैं। गो तस्करी में भी जेल जा चुका है। ऐसा व्यक्ति किसके इशारे पर काम कर रहा है इसकी भी जांच होना चाहिए। बहरहाल, चुनावी मौसम में इस तरह की घटनाएं बहुत कुछ वातावरण को बदल सकती हैं। एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में जो ये भगवा बनाम भगवा हुआ है ये भी सही नहीं है। राजनीति में एक दूसरे से विचारों का मतभेद हो सकता है लेकिन बात इतनी बढ़ जाए और कोर्ट कचहरी तक होने लगे तो फिर अच्छा संकेत नहीं जाता। जय हिंद