महामहिम का प्रोटोकॉल
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कई बातों को लेकर हमेशा विवादों में रही हैं। हालांकि उन्हें बंगाल की शेरनी कहा जाता है इसमें कोई दोराय भी नहीं है, लेकिन कुछ ऐसी घटनाएं हो जाती है जो लोकतंत्र के लिए अच्छा संदेश नहीं है। राष्टï्रपति द्रोपदी मुर्मू के बंगाल दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एवं उनकी सरकार का एक भी मंत्री उनके स्वागत के लिए नहीं गया। ये निदंनीय है। राजनीतिक लड़ाई अपनी जगह है लेकिन राष्टï्रपति का प्रोटोकॉल अपनी जगह है। कितनी भी राजनीति प्रतिद्वंद्वता हो लेकिन एक मुख्यमंत्री को अपना फर्ज जरूर निभाना चाहिए था। ये सरासर प्रोटोकॉल का उल्लघंन है। किसी कारणवश मुख्यमंत्री स्वयं नहीं गई लेकिन कम से कम उनके प्रतिनिधि के रूप में वरिष्ठ मंत्री को राष्टï्रपति का स्वागत करना चाहिए। हालांकि अब इस पर भी राजनीति शुरू हो गई है। राष्टï्रपति द्रोपदी मुर्मू ने नाराजगी जताई है। अब विपक्ष कह रहा है कि राष्टï्रपति को बयानबाजी से बचना चाहिए क्योंकि वो राजनेता नहीं है एक संवैधानिक पद पर हैं। विपक्ष का कहना है कि अन्य एजेंसियों की तरह भाजपा अब राष्टï्रपति का भी इस्तेमाल कर रही है। पक्ष-विपक्ष की बात पर कोई भी चर्चा भले ना हो लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं। ममता बनर्जी के इस कदम को कोई सही नहीं मान रहा है। राष्टï्रपति का एक प्रोटोकॉल है। वो सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन हैं और उनका स्वागत राज्य में करना अनिवार्य है। एक मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह की घटना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा संदेश नहीं है। कितना भी राजनीतिक मनमुटाव दिल्ली वालों से हो लेकिन राष्टï्रपति के स्वागत के लिए ममता बनर्जी अथवा उनके किसी मंत्री को जरूर मौजूद रहना चाहिए था। इस तरह की घटना एक नजीर बन जाएगी और फिर आने वाले समय में राजनेता राष्टï्रपति के प्रोटोकॉल का भी उल्लंघन करते नजर आएंगे। राष्टï्रपति भवन की नाराजगी जायज है और उस पर राज्य सरकार से जवाब तलब करना चाहिए ताकि इस घटना को नजीर ना बनाया जाए। जय हिंद