सपा में टूट की खबरें
पश्चिम बंगाल में टीएमसी में टूट के बाद महाराष्टï्र में शिवसेना में टूट की खबरें आयी, शिंदे के साथ उद्घव ठाकरे के सांसद चले गये, उद्घव ठाकरे में मिटिंग बुलाई उसमें वो छह सांसद शामिल नहीं हुए जो शिंदे के साथ थे। इस बीच योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने सपा में टूट को लेकर जो बयान दिया और बकायदा उन्होंने राम गोपाल यादव द्वारा गृहमंत्री को चिट्ठी की बात भी कही उसके बाद एक और मंत्री संजय निषाद ने भी 24 सांसदों के सपा छोडऩे की बात कही। इस बीच सपा के कई सांसद सपा की बैठक में नहीं गए। कुछ को बुलाया नहीं गया। इन तमाम बातों और चर्चाओं के बीच पार्टी के बुजुर्ग नेता रामगोपाल यादव की खामोशी इन चर्चाओं को हवा दे रही है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव की खामोशी भी कहीं ना कहीं इस बात का संकेत है कि भाजपा के सहयोगी दल के नेता जो बातें कर रहे हैं उसमें कुछ हद तक सच्चाई है। दरअसल, रामगोपाल यादव केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद से ही उनकी खामोशी सभी के सामने है। सपा नेता शिवपाल यादव बीच-बीच में जरूर कुछ कहते हैं लेकिन रामगोपाल यादव तो एक तरह से खामोश हो गये हैं। ना वो महंगाई पर बोलते, ना विदेश नीति पर बोलते, ना पेट्रोल की कीमतें बढ़ती तब बोलते, कानून व्यवस्था पर भी उनकी खामोशी है। जाहिर है वो भी कहीं ना कहीं बसपा प्रमुख मायावती की तरह ही खामोश हो गये हैं। सूत्र बताते हैं कि सबकी फाइलें खुली हुई है। यदि ये कुछ बोले फिर फाइलें खुलेंगी शायद इसी का डर है। लेकिन विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है अगर ईरान और अमेरिका का युद्घ चलता रहता तो शायद विधानसभा चुनाव दिसंबर में ही हो जाते। अब जिस तरह से खबरें आ रही है, ईरान अमेरिका के बीच समझौता हो गया है तो शायद चुनाव अगले साल ही हो। बहरहाल, इतनी तमाम चर्चाओं के बीच सपा नेताओं की खामोशी, कार्यकर्ता के उत्साह को कम कर रही है और कार्यकर्ता का उत्साह कम होता है तो फिर परिणाम भी ठीक नहीं होते। क्योंकि चुनावी मौसम में हवा के साथ-साथ कार्यकर्ताओं का उत्साह भी अहम भूमिका निभाता है। जय हिंद