गाजियाबाद (युग करवट)। प्रदेश में कई बार सत्ता में रहने वाली बहुजन समाज पार्टी की स्थिति राजनीति में ऐसी होगी ऐसा किसी ने सोचा नहीं था। ना लोकसभा में कोई सदस्य, राज्यसभा में कोई सदस्य, ना विधानपरिषद में कोई सदस्य, ना विधानसभा में कोई सदस्य, इसके पीछे क्या कारण है ये जग जाहिर है लेकिन कहावत है कि हाथी मरने के बाद भी लाखों का होता है। आज स्थिति ये है कि अगर इस बार विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का खाता नहीं खुला तो पार्टी का चुनाव चिन्ह भी बदल सकता है। लेकिन ऐसी उम्मीद कम है क्योंकि भले ही वो लोग जो इस बात को लेकर चर्चा कर रहे थे कि बसपा को लेकर कहीं कोई सरगर्मी नहीं है और अब कोई फ्री में भी बसपा का टिकट लेने को तैयार नहीं है। ऐसा नहीं है हाथी फिर झूम रहा है और अगर वो खुद झूमकर मजबूती से खड़ा नहीं भी हो पाया तो दूसरों को जरूर हिला देगा। जितना हाथी झूमेगा उतना ही समाजवादी पार्टी को नुकसान होगा और भाजपा को फायदा होगा। अभी हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा के कई कार्यकर्ता सम्मेलन हुए वहीं कुछ सीटों पर उम्मीदवार भी घोषित कर दिये गये। शिकारपुर से ब्राह्मïण समाज का मजबूत चेहरा मुकेश पंडित को उम्मीदवार घोषित किया गया। इतना ही नहीं बुलंदशहर की कई सीटों पर बसपा ने अपने पत्ते खोल दिये हैं। यहां ये भ उल्लेखनीय है कि बहुजन समाज पार्टी का एक कमिटेड वोट है जो 2014 में भी नहीं बंटा। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में जरूर उसमें सेंध लगी है। अगर यही सेंध आगे रही तो बसपा की राहें 2027 में आसान नहीं होंगी। वैसे भी बसपा प्रमुख की खामोशी उनके कार्यकर्ताओं के लिए सही नहीं है। अगर आज भी बसपा प्रमुख मायावती प्रदेश में खुलकर जनता के मुद्दों को उठायें और भाजपा की कमियों को लेकर आवाज बुलंद करें तो माहौल बदल सकता है लेकिन जैसे एआईएम प्रमुख अस्सुद्दीन ओवैसी भाजपा के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते और उनके निशाने पर सपा और कांगे्रस रहती है ठीक उसी तरह बसपा प्रमुख भाजपा के खिलाफ कोई आवाज बुलंद नहीं करती। इसी कारण ओवैसी और बसपा को भाजपा की बी पार्टी कहा जाता है।वास्तव में अगर बसपा प्रमुख खुलकर मैदान में आ जाये तो फिर समीकरण बदल सकते हैं क्योंकि दलित और मुस्लिमों का गठजोड़ के साथ अन्य बिरादरी भी बसपा से जुड़ जाती है तो फिर उत्तर प्रदेश की तस्वीर ही कुछ और होगी। आज मुसलमानों के साथ सबसे बड़ी समस्या ये है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है इसलिए वो साइकिल पर सवार हो जाते हैं। ओवैसी का यही दर्द है कि मुसलमानों को समाजवादी पार्टी में कुछ मिलता भी नहीं है उसके बाद भी वो सपा का झंडा उठाये रहते हैं और उन्हें केवल इस्तेमाल किया जाता है। ओवैसी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बयान अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने कहा था कि आजम खां जेल से बाहर आये ये सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी नहीं चाहते। यही कारण है कि आज आजम खां जेल में बंद हैं और सपा के प्रमुख चुनाव की तैयारी में लगे हैं। हालांकि रामपुर में ओवैसी की मीटिंग के बाद आज अखिलेश यादव रामपुर जेल में बंद आजम खां से मिलने गये हैं। अब देखना होगा कि मुलाकात हुई क्या बात हुई।