बलात्कारी ज्योतिषी बाबा अशोक खरात से कथित संबंधों को लेकर एनसीपी नेता रूपाली चाकणकर आजकल खूब चर्चाओं में हैं। चर्चाएं भी ऐसी ऐसी कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की महिला शाखा के प्रदेश अध्यक्ष पद से रूपाली के इस्तीफे के बाद भी खत्म नहीं हो रहीं। जांच में पता चला है कि ‘अय्याश बाबा’ जब भी अपने दफ्तर के अंदर किसी महिला को ‘शुद्धिकरण’ के नाम पर बुलाता था, तब झूमर की लाइट बंद कर देता था। यह स्टाफ के केबिन के अंदर ‘नो एंट्री’ का ‘कोड’ होता था। इससे स्टाफ समझ जाता था कि अंदर महिला का ‘उद्धार’ हो रहा है। यह बाबा तब तक डेढ़ सौ से अधिक महिलाओं का यौन शोषण कर चुका था, जब उसकी पोल खुली। इसी बाबा की चेली बन चाकणकर की भी पोल खुल गई । चलिए रूपाली चाकणकर को भुला भी दें मगर इस तथ्य का क्या करें कि इन दिनों गली गली शहर शहर इन बाबाओं और उनकी रूपालियों का ही बोलबाला है । देश भरा पड़ा है उन बाबाओं और उनके चेले चेलियों से, जो हमाम में ही नहीं मंचों पर भी नंगे नजर आते हैं। अब किस किसका नाम लें। आलम तो यह है कि कोई बाबा असली बाबा भी केवल तब तक ही है जब तक कि उसकी पोल पट्टी नहीं खुलती ।
बेशक सवाल किया जा सकता है कि जब देश में नकली दूध, नकली घरेलू सामान, नकली बैंक, नकली दूतावास, नकली आईएएस व आईपीएस और बाकी सबकुछ भी नकली हो सकते हैं तो नकली बाबाओं पर ही ऐतराज क्यों? सवाल जायज है कि मगर इस तथ्य पर आप क्या कहेंगे कि अन्य क्षेत्रों की बजाय धर्म कर्म के क्षेत्र में ही नकलियों का बोलबाल सर्वाधिक क्यों है? क्या इसका कारण यह तो नहीं कि सत्ता और उसके स्लीपर सेल इन बाबाओं ने ऐसा माहौल बना दिया है कि अंधविश्वास अब कोई हाशिये की चीज नहीं वरन् मुख्यधारा बन गई है। मंत्री से लेकर अभिनेता तक, वैज्ञानिक से लेकर उद्योगपति तक, हर कोई किसी न किसी बाबा के दरबार में नतमस्तक हैं। विज्ञान प्रयोगशालाओं में सिमट गया है, और चमत्कार टीवी चैनलों पर प्राइम टाइम में चल रहा है। कुंभ में करोड़ों की भीड़ जुटती है मगर तर्क की आवाज़ सुनने वाले गिने-चुने नजर आते हैं। आलम यह हो चला है कि आईआईटी के पढ़े-लिखे लोग भी ‘ज्ञान’ की नई दुकानें खोल रहे हैं। डिग्री दीवार पर टंगी है और आस्था मंच पर बिक रही है। सबसे दिलचस्प यह है कि यह सब खुलेआम हो रहा है। कोई छिपाने की जरूरत नहीं। क्योंकि विरोध करने वालों का अंजाम सबने देख लिया है। अंधविश्वास को बीमारी मानने वाले नरेंद्र दाभोलकर के हिस्से गोलियां आईं। वे ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन’ जैसी संस्था के जरिए समाज का इलाज करना चाहते थे मगर जब समाज को अपनी ही बीमारी से प्रेम हो जाए तो दाभोलकर जैसे डॉक्टर ज्यादा दिन तक भला कैसे टिकते। वे समझ ही नहीं पाए कि अपने मुल्क में अंधश्रद्धा सिर्फ श्रद्धा नहीं, एक व्यवस्थित उद्योग है, पूरी सप्लाई चेन के साथ। बाबा हैं, उनके चमत्कार हैं, भक्त हैं, दान है, और सबसे ऊपर अंधविश्वास का लोकतांत्रिक समर्थन है। ऐसे में जब कोई दाभोलकर आकर कहे कि ‘यह सब धोखा है’, तो यह केवल विचार नहीं, सीधा आर्थिक हमला माना जाता है। गोविंद पानसरे ने भी शायद यही गलती कर दी। उन्हें यह समझ नहीं आया कि दाभोलकर की हत्या कोई संदेश है। उन्होंने उसे चुनौती समझ लिया और वे भी गोलियों के शिकार हो गए। एम.एम. कलबुर्गी ने तो और भी बड़ी हिमाकत कर दी और उनका भी वही हश्र किया गया। संदेश साफ है। तीनों की एक ही समस्या थी, वे सोचते थे और उससे भी बड़ी समस्या, वे बोलते थे। अब कोई नहीं कह रहा कि जिस समाज में दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी मारे जाते हैं, वहां सिर्फ तीन लोग नहीं मरते, वहां सवाल मरते हैं, साहस मरता है, और धीरे-धीरे समाज अपनी सोचने की क्षमता खो देता है। नतीजा आजकल समाज अपने तरीके से ढल रहा है। घरों में आस्था बढ़ रही है, लेकिन सवाल घट रहे हैं। महिलाएं, परिवार, युवा सब इस चमकदार अंधेरे का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जहां तर्क असुविधाजनक है और चमत्कार सुविधाजनक। बाकी सब ठीक है ज्योतिषी बाबा, भक्त और गोलियां।