सीबीएसई और उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षाएं शुरू हो चुकी हैं। दोनों ही बोर्ड की यह परीक्षाएं किसी भी छात्र-छात्रा के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। इन परीक्षाओं को लेकर छात्र-छात्राएं तनाव पाल लेते हैं। जिसके कई बार गंभीर परिणाम सामने आते हैं। सरकार भी छात्र-छात्राओं की इस परेशानी और मानसिक तनाव के दबाव को समझती है। तभी तो प्रधानमंत्री परीक्षा पर चर्चा करते हैं, मन की बात में छात्रों के तनाव के दबाव को कम करने के टिप्स भी दिए जाते हैं। राज्य सरकारें भी अपनी ओर से काफी कुछ कर रही होती हैं। मगर उसके बावजूद परीक्षार्थी छात्र-छात्राएं तनाव में रहते ही हैं। अब बड़ा सवाल यह हो जाता है कि जब देश के प्रधानमंत्री खुद परीक्षा पर चर्चा करके छात्रों के दबाव को कम करने की बात करते हैं, जब राज्य सरकारें अपनी ओर से प्रयास करके छात्र-छात्राओं को दबाव मुक्त करने का कार्य करती हैं, तब क्यों छात्र-छात्राएं मानसिक तनाव पाल ही लेते हैं। वह क्या कारण हैं कि जिनसे प्रधानमंत्री और सरकार के प्रयास विफल हो जाते हैं। क्या इसकी वजह यह है कि हमारे समाज में अंक प्रणाली का ऐसा दायरा बना दिया गया है कि जिसमें छात्र-छात्राओं का दम घुटता है? दसवीं-बारहवीं कक्षा से ही प्रतियोगिता का ऐसा माहौल बना जाता है कि हर छात्र-छात्रा पर दबाव रहता है कि उसके माक्र्स, पड़ोसी या सहपाठी से कम नहीं आने चाहिए। क्या यह नंबरों की ही दौड़ है जिसमें छात्र-छात्राएं पिसकर रह जाते हैं? क्या हमारे समाज ने, अभिभावकों ने, शिक्षण संस्थाओं ने और यहां तक कि सरकार ने भी नंबरों की दौड़ को खत्म करने का प्रयास किया है? ऐसी क्या वजह है कि आज के दौर में अस्सी प्रतिशत अंक कोई मायने ही नहीं रखते? यहां तक कि नब्बे प्रतिशत अंक लाने वाले छात्र-छात्राएं भी रोते दिखाई देते हैं। क्या नंबरों की भागमभाग को निपटने की कोई योजना है? या फिर परीक्षा के तनाव और दबाव को दूर करने की बातें सिर्फ दिखावा हैं?