चर्चा-ए-आम
अब कुछ ऐसा लगने लगा है कि देश की नजर उतारे बिना काम नहीं चलेगा। लिहाजा हमें शीघ्र ही कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे हमारे देश भारत को लगी हमारी अपनी ही नजर किसी तरह उतर सके। हम कहां थे, वहां से कहां आ गए। जब हम आए थे तो हमने देश की जनता से कई वायदे किए थे। हमने कहा था कि हम देश में निरंतर बढ़ती महंगाई को आते ही नीचे गिरा देंगे। हमने यह भी कहा था कि देश जो हमारी विपक्षी व्यवस्था के हाथों इतना पिछड़ गया कि देश के नौजवान बड़ी संख्या में बेरोजगार हो गए तब हमने वायदा किया कि हम आते ही दो करोड़ नौजवानों को हर साल रोजगार देंगे लेकिन हमारे सभी प्रयासों के बावजूद बेरोजगारी लगातार बेतहाशा बढ़ती चली गई। हमने उस समय यह भी कहा था कि जब हम आएंगे तो देश के बाहर विदेशी बैंकों में जो देश का काला धन पड़ा है उसे वापस लाएंगे और देश के हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपए जमा करा देंगे। लेकिन कुछ ताकतों ने ऐसी दीवारें खड़ी की कि हम चाहते हुए भी ऐसा नहीं कर पाए। हमें पूरा विश्वास था अपनी राष्ट:वादी सोच पर और देश के प्रति अपनी ईमानदारी और निष्ठा पर लेकिन हमारे पुरजोर प्रयासों के बावजूद हमें सफलता नहीं मिल पाई। हमने व्यवस्था में आते ही लोगों से वायदा किया और उस वायदे को पूरा करने के लिए अथक प्रयास भी किए यह कहते हुए कि हम देश को सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास की नीति पर चलाएंगे लेकिन हमारे विपक्षियों ने कुछ ऐसा माहौल बनाया कि देश में हिन्दू-मुसलमान की सोच वाली नफरत ने अपनी जगह बना ली और हम अपने इन प्रयासों में सफल नहीं हो पाए। हमने बड़ी ईमानदारी से संपूर्ण राष्ट: समर्पण की भावना से यह प्रयास भी किया कि हम जातिवाद का मतभेद पैदा ना होने दें इसलिए हम निरंतर कहते रहे कि हमारे लिए सिर्फ चार ही जातियां हैं, हमारे देश का नौजवान, हमारे देश की महिलाएं, हमारे देश का किसान और हमारी फौज के जवान। फिर ना मालूम कैसे यूजीसी ने एक नया नियम बना दिया और हमारी जातिये समानता के प्रयासों को खंडित कर दिया। हमारे पिदने से पड़ोसी देश जिसकी हिम्मत हमारे सामने कभी सर उठाने तक की नहीं थी फिर ना जाने कैसे उसमें इतना साहस आ गया कि उसने घाटी के पुलवामा में एक फौजी बस पर हमला करके हमारे 40 से अधिक सैनिक मार डाले और उसी पिदने से देश ने हमारी सीमा के अंदर कई किलोमीटर घुसकर पहलगांव जैसे प्राकृतिक सौन्दर्य के हमारे पवित्र स्थल पर हमला बोलकर हमारे देश की 26 महिलाओं के सिंदूर उजाड़ दिये और उसी पिदने पड़ोसी देश ने हमारी राजधानी दिल्ली में घुसने की हिमाकत कर बम विस्फोट किया और हमारे दर्जनों लोग हताहत कर दिये। हमने अपने अन्न देवता किसानों के हित के लिए तीन नए किसान बिल लाने की कोशिश की लेकिन हमारे विपक्षियों ने किसानों को बहला फुसलाकर उन बिलों को काला बिल बताना शुरू कर दिया और हमें उसे वापस लेकर किसानों से माफी भी मांगनी पड़ी। और अब जब हम अपने देश के लिए अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को झुकाकर कम टैरिफ पर ट्रेड डील कराने के प्रयासों में जुटे तो हमारे विपक्षी दलों ने उसे किसान विरोधी और राष्ट: विरोधी बताकर उसकी मुखालफत शुरू कर दी। इतना ही नहीं हमारी सरकार के एक मंत्री पर अनाप शनाप आरोप लगाकर उसे एपस्टिन फाइल का हिस्सा बताकर हमारी सरकार को बदनाम करने की कोशिशें आरंभ कर दीं। अब ऐसे में हम करें तो क्या करें। हमने तो सनातन की राह चलते हुए भारत को हिन्दू राष्ट: बनाने की कोशिशें की जिसके लिए हमने अपने सभी देवताओं का आशीर्वाद भी प्राप्त किया लेकिन फिर भी ना जाने क्यों हमेंं हमारी निष्ठा, लगन और ईमानदारी के वो परिणाम नहीं मिल पा रहे जो हम चाहते हैं। ऐसे में देश के कुछ राजनीतिक विशषज्ञों का मानना है कि सत्ता पक्ष से जुड़े प्रमुख राजनेताओं को अपनी पार्टी पर लगी अपनी ही नजर को उतरवाने की दिशा में विचार करना चाहिए। उनके द्वारा यह भी माना जा रहा है कि केन्द्र में सत्ता की व्यवस्था संभाले राजनेताओं पर शनि भारी है और उनका दल शनि की वक्र दृष्टि से पीडि़त होता नजर आ रहा है ऐसे में उन्हें अपनी धार्मिक आस्थाओं में शनि को भी बराबर का स्थान देना चाहिए और अयोध्या, काशी, मथुरा की तरह प्रभु शनि देव के एक विराट मंदिर के निर्माण पर भी विचार करना चाहिए। देश जब धार्मिक आधारों पर चल रहा है तो हर दृष्टिकोण से धार्मिक आधारों को मानना चाहिए। नजर उतरवाने के साथ ही हमारे ये धार्मिक राजनेता अगर शनि की शरण में भी आ जाएं तो पापा ट्रंप, पिदना पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, झूले झूलकर दगा देने वाला चीन और चीखने चिल्लाने वाले ये विपक्षी नेता भी हमारी सत्ता की पकड़ में आ जाएंगे। आपकी क्या राय है। क्या हम सही दिशा जा रहे हैं।