किसी को नहीं मालूम कि केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी दुनिया के सबसे जघन्य अपराधियों में से एक जेफरी एपस्टीन से निजी हैसियत से मिलते थे या हाई कमान के आदेश पर वह देश का कोई हित साध रहे थे? वह भी तब, जब एपस्टीन के सारे अपराध खुल चुके थे और वह जेल यात्रा भी कर चुका था? यह भी कोई नहीं जानता कि देश विदेश के बैंकों के हजारों करोड़ रुपये हजम करने के बावजूद छुट्टा घूम रहा हाई प्रोफाइल उद्योगपति अनिल अंबानी अपराधी एपस्टीन से देश की नीतियों के बाबत क्यों बातें करता था? अनिल अंबानी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तमाम मेहरबानियों के पीछे भी क्या कोई बड़ा राज है या यह सब यूं ही इत्तेफ़ाकन है? विपक्ष कुछ भी कहे मगर इसका भी खुलासा अभी तक नहीं हुआ है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ट्रंप से क्यों इतना खौफ खाते हैं और उसके द्वारा करियर बर्बाद करने जैसी बातें कहने पर भी चुप्पी साधे हुए हैं ? कोई नहीं जानता कि क्या भारत अमेरिका व्यापारिक समझौते के पीछे भी मोदी जी का कोई ऐसा निजी राज है जो देश हित पर भारी पड़ रहा है अथवा ये सब बातें हवा हवाई हैं ? हवाओं में इनदिनों ढेरों सवाल हैं मगर उनके जवाब तय नहीं हैं। हां एक बात अवश्य तय है कि अपने नेताओं पर हम भारतीयों का विश्वास दिन प्रति दिन डगमगा रहा है और हाल के वर्षों में इसमें कुछ ज्यादा ही इजाफा हुआ है। आजादी के बाद से आज के दौर तक निगाह डालें तो अग्रिम पंक्ति में खड़े अपने तमाम बड़े नायकों पर लोगों का अविश्वास बढ़ता ही गया है। कश्मीर और चीन के मामले में पता नहीं नेहरू से चूक हुई अथवा नहीं मगर इसके बाद तो जैसे तय ही हो गया कि हमारे रहनुमा भी हाड़ मांस के इंसान हैं और वे भी हम सब की तरह मानवीय कमजोरियों से लबरेज हैं । माना जाता था कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का अपने नेताओं पर भरोसा ही था मगर शनै-शनै यही सर्वाधिक खतरे में पहुंच गया है । हर दौर में कोई न कोई नेता, कोई न कोई आंदोलन, कोई न कोई नारा इस भरोसे को नई ऊँचाई देने की कोशिश करता तो नजऱ आया मगर कड़वी सच्चाई यह है कि यह भरोसा हर बार छला ही जाता रहा है। इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ से लेकर जय प्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ तक, वीपी सिंह द्वारा उठाए गए ‘बोफोर्स घोटाले’ से लेकर अन्ना हजारे और केजरीवाल के ‘लोकपाल बिल’ तक, ‘राम मंदिर’ आंदोलन से लेकर ‘मंडल कमीशन’ तक और अब मोदी जी के ‘विकास’ और ‘सुशासन’ के वादों तक, भारतीय राजनीति का इतिहास बड़े सपनों और उनके टूटने का इतिहास ही नजऱ आता है। बड़े घोटालों, झूठे वादों और स्तरहीन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच आम नागरिक के मन में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या सत्ता वास्तव में जनता के लिए काम करती है या केवल अपने हितों के लिए? सुना था कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता से जीवित रहता है मगर अब कहां बची है यह विश्वसनीयता? एपस्टीन फ़ाइल्स से जुड़े दस्तावेजों और कथित संपर्कों को लेकर उठी चर्चाओं ने यकीनन इस बची खुची विश्वसनीयता की भी तो हत्या कर दी है। भले ही इन मामलों में सत्य क्या है और क्या नहीं, इसका अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रियाएँ ही करेंगी, लेकिन क्या केवल नामों के जुडऩे या चर्चाओं के फैलने भर से ही सार्वजनिक धारणा प्रभावित नहीं होती है? राजनीति में धारणा तो अक्सर तथ्य से भी अधिक शक्तिशाली साबित होती है। जनता के मन में संदेह उत्पन्न हो जाए तो उसे मिटाना अत्यंत कठिन हो जाता है। जब आम नागरिक देखते हैं कि सत्ता में बैठे लोग नैतिकता और शुचिता की बात तो करते हैं मगर समय-समय पर उनके आचरण को लेकर ही जब प्रश्न उठते रहते हैं तो स्वाभाविक रूप से निराशा जन्म लेती है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत ही यह है कि सत्ता जनता से शक्ति लेती है मगर यहां जब जनता के सुख दु:ख की बातें केवल चुनावी भाषणों तक ही सीमित होकर रह गई हैं तो व्यवस्था पर उसका भरोसा कैसे न डगमगाए? शायद यही तो कारण नहीं कि जो पढ़ लिख जाता है और राजनीतिक दलों की नीतियों और उनके नेताओं को भली भांति समझ जाता है वह वोट देने ही नहीं जाता और जो वोट देने जाते हैं उनका धर्म, जाति और तात्कालिक लाभ के अतिरिक्त अन्य किसी बात से कोई लेना देना ही नहीं होता। भारतीय लोकतंत्र का यह विरोधाभास क्या चिंताजनक नहीं है कि जहाँ साक्षरता और आर्थिक समृद्धि अधिक है, वहाँ मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम होता जाता है और जहां जहां गरीबी और अशिक्षा है, वहां जोर शोर से मतदान होता है। यह प्रवृत्ति चुनावी आँकड़ों में भी हर बार झलकती रही है। हमारे नेता भी इस विरोधाभास का दोहन करना सीख चुके हैं और उन्हें पता है कि चुनाव कैसे लड़े और जीते जाते हैं। शायद यही कारण हो कि एपस्टीन फाइल जैसे खुलासों से उनकी धूमिल होती विश्वसनीयता से भी कहीं कोई भूचाल आता नहीं दिखता ।