हिंदू सम्मेलनों का आयोजन
हर जगह हिंदू सम्मेलनों का आयोजन हो रहा है। पूरे देश में संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में ये आयोजन हो रहे हैं। हालांकि इन सम्मेलनों को राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है, लेकिन मेरा मानना ह$ै कि समाज को जोडऩा एक अच्छा प्रयास है। सम्मेलनों में किसी जाति और धर्म के खिलाफ कुछ नहीं बोला जा रहा है। केवल अपने समाज को एकजुट करने का प्रयास किया जा रहा है। यह एक अच्छा प्रयास है और सभी को अपने समाज को एकजुट करने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन यह प्रयास केवल चुनावी मौसम तक सीमित नहीें रहना चाहिए। हिंदू सम्मेलन एक शुभ संकेत है। समाज का जुडऩा, एकत्र होना और एक-दूसरे से संवाद करना ये आज के माहौल में आवश्यक भी है, लेकिन सम्मेलनों और मंच तक ही यह संवाद सीमित नहीं रहना चाहिए। मंचों से हटकर भी समाज के प्रति लोगों का जुड़ाव रहना चाहिए। सम्मेलनों के माध्यम से इस बात का भी प्रयास होना चाहिए कि समाज का पिछड़ा वर्ग जो शिक्षा और गरीबी से जूझ रहा है उसके उत्थान के लिए भी इन सम्मेलनों में विचार करना चाहिए। समाज का पिछड़ा वर्ग अगर इन सम्मेलनों से नहीं जुड़ेगा तो फिर इन सम्मेलनों का कोई अर्थ नहीं है। आज आवश्यकता है स्थायी योजनाओं की। तालियों से कभी समस्या का समाधान नहीं होता। भावनात्मक नारों से भी समाज का उत्थान नहीं होता। हिंदू समाज एक ऐसा समाज है जो सभी को सभी समाज के प्रति एक अच्छी सोच रखता है। हिंदू समाज की असली ताकत सबसे कमजोर व्यक्ति को सफल बनाने में है। सम्मेलनों में बंटोगे-कटोगे जैसी बातें होती हैं। लोग इन नारों को केवल चुनावी नारा ही समझते हैं। जबकि कोई भी समाज हो अगर उसमें बंटवारा होता है तो फिर इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। हिंदू सम्मेलनों का आयोजन नि:संदेह समाज को जोडऩे का और एक मंच पर सभी समाज को लाने का है। जातियों में बंटने वाले लोगों को एक मंच देना है, लेकिन ये सिर्फ वोट बैंक की राजनीति तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि वास्तव में सबको एकजुट करना है तो फिर ऐसे सम्मेलन लगातार होते रहने चाहिएं और समाज के उन अंतिम और पीडि़त व्यक्ति तक इन सम्मेलनों का संदेश जाना चाहिए तभी इसका सही मायने में लाभ होगा। हालांकि कुछ सियासी दल वोट की राजनीति से प्रेरित देख रहे हैं। जय हिन्द