लापता लोगों का मामला
सोशल मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक चैनलों में दिल्ली में ८०० लोगों के लापता होने के समाचार से आमजन में एक खौफ पैदा हो गया है। दरअसल आगे निकलने की होड़, बिग ब्रेकिंग के चक्कर में समाज में हम क्या परोस रहे हैं। इस पर कोई ध्यान नहीं देता। ऐसा नहीें है कि यह लापता होने का सिलसिला कुछ दिन से ही चल रहा है। राजधानी दिल्ली में हर दिन ५० लोग लापता होते हैं। जिनमें महिलाएं और बच्चे भी होते हैं। हालांकि यह मामला बहुत गंभीर है, लेकिन लापता होने के पीछे कई अन्य कारण होते हैं, लेकिन जिस तरह से अभी हाल ही में लापता होने की खबरें सामने आई हैं और मीडिया में उसे बिना सर्वेक्षण और जांच के दिखाया गया, उससे पैनिक फैल गया। पैनिक फैलना भी स्वाभाविक था, लेकिन सवाल यह है कि हमारी क्या जिम्मेदारी है। हम क्या केवल पैनिक फैलाकर अपनी टीआरपी बढ़ाना चाहते हैं, क्या हम डर बेचकर एक माहौल को पैनिक करना चाहते हैं। केवल इसलिए कि हम सबसे आगे रहें। देखने में आया है कि किसी भी ब्रांड या मीडिया में इस तरह की खबरें दिखा दी जाएं जिससे एकदम टीआरपी बढ़ जाए, ब्रांड की पब्लिसिटी हो जाए, लेकिन ऐसे लोग यह नहीं सोचते कि इससे समाज में कितना बुरा असर पड़ता है। पिछले एक दशक से कोई भी फिल्म आती है उससे पहले उसमें इस तरह की चीजें प्रचारित कर दी जाती हैं जिससे एकदम वो चर्चा में आ जाती है। अभी हाल ही में घूसखोर पंडत को लेकर जिस तरह से माहौल गरम हुआ। धरना प्रदर्शन हुए, मुकदमेबाजी हुई। उससे एकदम इस फिल्म को लेकर लोगों में उत्सुकता बढ़ गई। रिलीज होने से पहले ही इस फिल्म ने इतना प्रचार पा लिया कि अब जैसे ही फिल्म रिलीज होगी यह अच्छा मुनाफा पा लेगी। डायरेक्टर ने माफी मांग ली। फिल्म के हीरों ने भी बयान जारी कर दिया। कुछ प्रोमो भी हटा दिये गये। सियासत भी हुई। बसपा प्रमुख मायावती फिल्म के खिलाफ खुलकर सामने आईं। उन्होंने इसे ब्राह्मïण समाज का अपमान बताया। मुख्यमंयी योगी आदित्यनाथ की ओर से एक्शन लिया गया। मतलब अभीतक ना फिल्म देखी ना कुछ हुआ केवल टाइटल पर ही सियासत हो गई। जाहिर है कि यहां भी डर बेचा गया। कहीं ब्राह्मïण नाराज ना हो जाएं, इसका डर सभी को था। बहरहाल टीआरपी और सियासत किस तरह चलती रहे इसी को लेकर बस सब माहौल चल रहा है। इसका कोई ख्याल नहीं रखा जाता कि समाज पर क्या असर पड़ेगा। मीडिया की अहम जिम्मेदारी है लेकिन मीडिया भी अब आगे निकलने की होड़ में, टीआरपी के चक्कर में वो सबकुछ परोस रही है जिसकी कभी उम्मीद नहीं थी। यही कारण है कि जिस तरह की घटनाएं होती है उससे समाज कहीं ना कहीं जो परोसा जा रहा है उससे प्रभावित होता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और हम समाज में क्या संदेश दे रहे हैं इस पर भी आत्ममंथन की जरूरत है। जय हिन्द