यूपी मंत्रिमंडल में विस्तार में देरी क्यों!
राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ नहीं पता। कौन फर्श से अर्श पर चला जाए और कौन अर्श से फर्श पर आ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। आज की बदलती हुई राजनीति में कई ऐसे उदाहरण सामने हैं। जिनकी तूती बोलती थी और हवा भी बचकर निकलती थी आज वो राजनीति में उस हाशिए पर है जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी। राजनीति में कहावत है कि सोए तो मंत्री और उठे तो सतंरी ऐसी ही कुछ तस्वीरें चलती रहती हैं। पिछले चार साल से यूपी में मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं चल रही हैं। अब विधानसभा चुनाव में मात्र 11 महीने बचे हैं लेकिन अभी भी मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हो रहा है। क्योंकि हर बड़ा नेता दिल्ली से लेकर लखनऊ तक अपनी गोटियां फिट करना चाहता है। लोकसभा चुनाव २०२४ में यूपी में भाजपा सत्ता में होते हुए भी दूसरे नंबर की पार्टी बन गई और पीडीए संविधान बचाओ के सहारे सपा यूपी में नंबर वन और देश में तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। जाहिर है कि डबल इंजन की सरकार के लिए ये करारा झटका है इसलिए अब भाजपा को भी अब पीडीए के रास्ते पर चलना पड़ रहा है। इसीलिए अब यूपी के विस्तार की तस्वीर भी कुछ इसके आसपास ही होगी। राजनीतिक गलियारों में हो रही चर्चाओं पर भरोसा करें तो भाजपा हाईकमान यूपी के दो उपमुख्यमंत्रियों में एक को हटाकर कुछ बड़ी जिम्मेदारी देने जा रही है वहीं पुलिस विभाग में बड़े पद पर रहे एक अधिकारी जो अब सेवानिवृत्त हो गये हैं और आज भी एक महत्वपूर्ण पद पर है उनको उप मुख्यमंत्री बनाकर सपा के पीडीए फार्मूले पर करारा जवाब देना चाहती है। दरअसल, दिल्ली और लखनऊ के बीच सबसे ज्यादा तनातनी उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या को लेकर है। केशव प्रसाद मौर्या को साइड करके उनके स्थान पर एक दलित उपमुख्यमंत्री बनाने की योजना है। अब इस योजना पर क्या मुहर लगेगी या फिर कुछ और होगा ये आने वाले समय में दिखाई देगा। लेकिन ये जरूर है कि उत्तर प्रदेेश की राजनीति में बहुत कुछ बदलाव होने जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बढ़ती लोकप्रियता और मजबूत सरकार वो चला रहे हैं इसलिए दिल्ली वाले डायरेक्ट कोई पंगा लेेने के मूड में नहीं है। क्योंकि दिल्ली और लखनऊ के बीच तू डाल-डाल मैं पात-पात वाली कहावत कई मौकों पर देखी गई है। अब देखना है कि आने वाले समय में जो चर्चाएं चल रही है उन पर मुहर लगेगी या फिर वो चर्चाओं तक ही सीमित रहेगी। जय हिंद