50 साल से ऊपर के लोग क्या करेंगे भाजपा में?हर राजनीतिक दल की तरह भारतीय जनता पार्टी का भी अपना एक संविधान है। पार्टी नियमों से ही चलती है। पार्टी के संविधान को हर पदाधिकारी और हर कार्यकर्ता को मानना पड़ता है। मगर लगने लगा है कि अब भाजपा में ऐसा नहीं हो रहा है। सवाल उठने लगा है कि क्या भाजपा के पदाधिकारी ही अपनी पार्टी के संविधान का स्वीकार नहीं कर रहे हैं? क्या भाजपा में अब अपनी मर्जी से नियम बनाए जा रहे हैं? भाजपा में अभी नए नए प्रदेश अध्यक्ष बने हैं। सुनने में आया है कि उन्होंने नियम लागू कर दिया है कि अब संगठन में जिम्मेदारी पचास साल से कम उम्र के लोगों को ही मिलेगी। राजनीति में 50 साल की उम्र के लोग तो खुद युवा कहलाना पसंद करते हैं। जब 20-25 साल का नौजवान राजनीति में आता है तो 50 का होने तक वह मंझ जाता है। उसके पास संगठन का और सरकार दोनों का प्रयाप्त अनुभव होता है। एक अच्छी टीम उनके पास होती है। यह वही समय होता है जब संगठन उनका पूरा लाभ उठाना शुरू कर देता है। मगर वर्ष 2014 के बाद लगने लगा था कि अब भाजपा को अपने बुजुर्गों की कोई आवश्यकता नहीं है। मगर अब 2026 में लगने लगा है कि भाजपा को अपने अनुभवी कार्यकर्ताओं की भी जरूरत नहीं रह गई है। वैसे भी पचास साल किसी के रिटायर होने की कोई उम्र नहीं है। पहले लगा कि शायद प्रदेश कमेटी में ही पचास साल के लोगों को नहीं रखा जाएगा, मगर अब सुन रहे हैं कि जिला कमेटियों में भी यही नियम लागू कर दिया गया है। अगर यह सही है तो समझ लीजिए कि अब भाजपा में पचास साल से ऊपर के लोगों की कोई आवश्यकता नहीं है। जिला, क्षेत्र आदि कमेटियों की घोषणा में हुई देरी ने वैसे ही भाजपा कार्यकर्ताओं को निराशा में डाल रखा है। यूजीसी को लेकर सवर्ण कार्यकर्ता नाराज हो चला है। ऐसे में यह नए नए प्रयोग करके भाजपा का नेतृत्व क्यों अपने पैरों पर कूल्हाड़ी मारने का प्रयत्न कर रहा है? मूल संविधान के नियमों पर चलकर ही पार्टी यहां तक पहुंची है। इसे जिना जल्दी स्वीकार किया जाएगा उतना ही बेहतर रहेगा।