सुधार एक ऐसी गतिविधि है जो हर समय चलती रहती है। हर काल खंड में, हर व्यवस्था में, हर समाज में, हर विभाग में हर समय सुधार की गुंजाइश रहती ही है। कोई व्यक्ति विशेष हो, संस्था हो या विभाग उसे सुधार की गुंजाइश को स्वीकार करते रहना चाहिए। इससे व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ होती है, समाज को इसका लाभ मिलता है। पुलिस अधीक्षक से कमिश्नरेट तक गाजियाबाद की पुलिस व्यवस्था में बदलाव किया गया। पुलिस अधीक्षक के समय पुलिस की जो कार्यप्रणाली थी उसमें अनेक बदलाव किए गए। उन बदलावों का अच्छा असर भी देखने को मिला। पुलिस के काम काज में परिवर्तन हुआ और लोगों के प्रति व्यवहार में भी। थानों की काया पलट की गई, थाने में आने वाले लोगों को बेहतर सुविधाएं मिलने लगीं। अधिकारी निरंतर सुनवाई भी करते हैं। मगर अभी अभी कहीं ना कहीं चूक रह ही जाती है। यह तो हम सभी जानते हैं कि किसी भी बड़े अधिकारी के पास अगर जनसमस्याओं की भीड़ पहुंच रही है तो कहीं ना कहीं निचले स्तर पर लोगों की सुनवाई नहीं हो रही है। अगर थाना स्तर पर ही लोगों को संतुष्टिï मिल जाए तो कोई भी व्यक्ति एसीपी या डीसीपी तक जाएगा ही क्यों? इस पर काम क्यों नहीं किया जाता कि एसीपी, डीसीपी के कार्यालय पर शिकायतकर्ताओं की भीड़ कम हो जाए। ऐसा भी कुछ होना चाहिए कि यह देखा जाए कि किस थाने से संबंधित अधिक शिकायतें एसीपी, डीसीपी तक पहुंचती हैं। यह भी परखा जाना चाहिए कि थाना स्तर पर समस्या का निस्तारण किस संख्या में हो रहा है। जिन थानों से अधिक लोग उच्चाधिकारियों तक पहुंचते हैं उन थानों की कार्यप्रणाली जांची जानी चाहिए। आवश्यक हो तो ऐसे थानों के प्रभारी और अन्य स्टाफ पर कार्रवाई भी की जानी चाहिए। ताकि व्यवस्था में सुधार संभव हो सके। क्योंकि मुझे नहीं लगता कि किसी भी अधिकारी की मंशा यी रहती हो कि उनके पास से कोई व्यक्ति शिकायत लेकर ऊपर तक जाए। सभी यही चाहते होंगे कि उनसे मिलने आए प्रत्येक व्यक्ति की समस्या का समाधान हो।