नई दिल्ली (युग करवट)। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई बहुप्रतीक्षित उच्च-स्तरीय वार्ता आखिरकार किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी। करीब 21 घंटे तक चली इस गहन बातचीत का उद्देश्य दोनों देशों के बीच जारी सीजफायर को स्थायी शांति में बदलना था, लेकिन जमीनी सच्चाई और कूटनीतिक जटिलताओं ने इस प्रयास को विफल कर दिया। दरअसल, 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इजऱायल बनाम ईरान टकराव ने पहले ही वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित कर दिया था। पूरे मिडिल ईस्ट को अस्थिरता के मुहाने पर ला खड़ा किया था। ऐसे में यह वार्ता केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता से भी जुड़ी हुई थी। इस्लामाबाद में बातचीत की मेज पर सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों का अडिग रुख रहा। अमेरिका ने साफ तौर पर मांग रखी कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को तत्काल रोके। इसके साथ ही भविष्य में परमाणु हथियार विकसित न करने की गारंटी दे। इसके जवाब में ईरान ने अपनी पुरानी बात दोहराई कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है। ईरान किसी भी तरह की पाबंदी या बाहरी दबाव को अस्वीकार कर दिया। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बातचीत के बाद कहा कि हम उस स्थिति तक ही नहीं पहुंच पाए, जहां ईरान हमारी शर्तों पर विचार करता। दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों को बहुत अनुचित बताया. ईरान खुद को रणनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में देख रहा था। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की वेट एंड वॉच रणनीति ने उसे बातचीत में झुकने से रोके रखा, जबकि अमेरिका तत्काल परिणाम चाहता था।
यही असंतुलन बातचीत की पहली बड़ी विफलता साबित हुआ।
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