क्या भाजपा में वरिष्ठों को दरकिनार करने की नीति को बल दिया जा रहा है? यह सवाल असहज करता है, मगर आजकल के जो हालात हैं उन्हें देखकर इस सवाल को अनदेखा तो नहीं किया जा सकता। यह भी समझना होगा कि वरिष्ठ का मतलब उम्रदराज तो कतई नहीं है। यह भाजपा के वह कार्यकर्ता हैं जो अनेक वर्षों से पार्टी का झंडा बुलंद किए हुए हैं और अभी पचास के आसपास ही हैं। न तो उनकी सेवा पर सवाल उठाए जा सकते हैं ना उनके सर्मपण पर। मगर उनके सामने खुद को बनाए रखने की चुनौती यह है कि अनुभव में उनसे कमतर लोग महत्वपूर्ण पदों पर आ चुके हैं। उम्र या तो कम है या लगभग बराबर ही हैं। अपने से छोटे या बराबर उम्र वाले का पद बड़ा हो तो कई तरह के संवैधानिक संकट पैदा हो जाते हैं। सबसे बड़ा मामला तो यह आ जाता है कि कोई अपने बराबर उम्र वाले या छोटे को भला कोई आदेश कैसे देगा। दूसरा यह कि भला अपने बराबर के या छोट ेसे कोई किसी प्रकार का आदेश लेगा क्यों? भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष पचास से कम उम्र के हैं। ऐसे अनेक नेता हैं जो उम्र में भी और अनुभव में भी उनसे वरिष्ठ हैं। ऐसे नेता अगर राष्टï्रीय टीम में शामिल किए गए तो नए अध्यक्ष को काम करने में मुश्किल हो जाएगी। यही संकट गाजियाबाद के महानगर अध्यक्ष मयंक गोयल के सामने भी है। ऐसे में अगर वह कहते हैं कि यदि वरिष्ठ लोग महानगर कमेटी में आ गए तो वह किसी को कोई आदेश कैसे दे पाएंगे, तो इसमें गलत क्या है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ऐसे में उन कार्यकर्ताओं का क्या होगा जिनकी उम्र तो पचास साल है या कम है मगर संगठन का अनुभव काफी ज्यादा है। क्या ऐसे कार्यकर्ताओं को पार्टी घर बैठा देगी? या उनका किसी अन्य तरीके से उनका उपयोग लिया जाएगा। क्योंकि यदि वरिष्ठ कार्यकर्ता घर बैठ गए तो पार्टी की जनसंपर्क की चेन टूट जाएगी। ताजे कार्यकर्ताओं के पास जोश तो होगा, मगर अनुभवहीनता का तोड़ उनके पास नहीं होगा।