अब भारत बदल रहा है
पहले किसी जमाने में फिल्में जब बना करती थी तो वो मनोरंजन के लिए बना करती थी। हालांकि पहले की फिल्मों की बात करें तो उसकी कहानियां भी बिल्कुल एक जैसी होती थी। हर फिल्म की कहानी में मुस्लिम चाचा जी की भूमिका हमेशा अच्छी दिखाई जाती थी, उनका चरित्र अच्छा दिखाया जाता था, ईमानदार बताया जाता था। जंजीर फिल्म में खान साहब के मूंछ के बाल की अहमियत दिखाई जाती थी। साहूकार खान साहब के बाल को जमानत के तौर पर रखते थे उन्हें पैसे दे दिया करते थे। लेकिन जैसे-जैसे माहौल बदलने लगा और दो दशक से कहानियों का स्वरूप ही बदल गया। अब फिल्मों के जरिये भी संदेश दिये जाने लगे। अधिकतर फिल्में दो समुदायों को लेकर बनने लगी। पड़ोसी मुल्क को लेकर तो बहुत फिल्में बनी। जब तक मुस्लिम चाचा का किरदार ईमानदार दिखाया जाता रहा तब तक तो सबकुछ सही था। अंडरवल्र्ड माफिया दाउद पर भी कई दर्जन फिल्में बनीं उसमें उसका पूरा जलवा दिखाया गया तब तक सबकुछ सही था। लेकिन अब धुरंधर टू में एक माफिया को आईएसआई का एजेंट बताया गया तो जरूर मिर्ची लगने लगी। आखिरकार ये नहीं होना चाहिए। २०१४ के बाद भारत बदल गया है। अब देश का नेतृत्व एक मजबूत हाथों में है, नई सोच के हाथों में है, जाहिर है कि उसी सोच की फिल्में भी बनेंगी, लेकिन धुरंधर को लेकर बेवजह बयानबाजी हो रही है। जिनको आईएसआई का एजेंट बताया वो इस दुनिया में नहीं है। यदि उनके परिवार को इस किरदार से कुछ शिकायत हो तो वो कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। अब फिल्में ही नहीं बल्कि टीवी पर आने वाले सीरियलों की भी स्क्रिप्ट पूरी तरह से बदल गई है। अब सीरियलों में भी कुछ इसी तरह की तस्वीरें दिखाई जा रही है। हालांकि टीवी पर दिखाये जाने वाले सीरियल इस तरह की कहानी नहीं बयां कर रहे हैं, लेकिन वो भी समाज को दूसरे रास्ते पर ले जाने के लिए जरूर संदेश दे रहे हैं। फिल्मों को लेकर राजनीति नहीं होना चाहिए। हर जमाने में, हर दौर में अपने-अपने हिसाब से स्क्रिप्ट बनाई जाती रही है। अब जैसा देश है उसी हिसाब से फिल्में बन रही हैं तो इस पर बहस की कोई आवश्यकता नहीं है। जय हिंद