राजनीति में संयम जरूरी
राजनीति में संयम बहुत जरूरी है। शब्दों का चयन भी उतना ही जरूरी है। कभी-कभी शब्दों के तीर बहुत घाव कर देते हैं। हालंाकि डेढ़ दशक से राजनीति की जो तस्वीर सामने है उसमें सारा खेल नारों का और शब्दों का ही चल रहा है। बड़े-बड़े नारों से चुनाव का माहौल भी बदला जा रहा है। ना महंगाई पर बात होती है, ना किसी चीज पर संवाद होता है। जबकि हर क्षेत्र में संवाद बहुत जरूरी है। संवाद से रास्ते भी निकलते हैं और दूरियां भी कम होती है। पहले लोकसभा और राज्यसभा एक संवाद का जरिया थी लेकिन अब यहां सबसे ज्यादा संवाद का ही टोटा है। अब व्यक्तिगत आरोप इतने लगने लगे हैं जिसकी कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। अब पदों पर नहीं नाम लेकर प्रहार होते हैं। लोकसभा हो या राज्यसभा हो यहां पर सत्ता पक्ष और नेता प्रतिपक्ष के बीच संवाद होना बहुत जरूरी है लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है। लोकसभा में जो कुछ हो रहा है वो पूरे देश के सामने हैं। यहां पर किसी ऐसे बिंदू पर चर्चा नहीं होती जो आमजन से जुड़ा हो, यहां केवल चर्चा होती है अडानी पर और अंबानी पर। बस हर सदन की कार्रवाई इन दोनों के आसपास ही सीमित रही है। अब एक नई एपेस्टिन फाइल चर्चाओं में है। राहुल गांधी को कुछ ज्यादा ही गुस्सा इस बार आ रहा है। सदन से लेकर बाहर मीडिया कर्मियों पर वो अपना गुस्सा निकाल रहे हैं। प्रधानमंत्री उनके निशाने पर हैं। लोकसभा स्पीकर उनके व्यवहार से बहुत आहत हैं। राहुल भी लोकसभा स्पीकर काम करने के तरीके से अपने आपको असहज महसूस कर रहे हैं। राहुल ने सीधा मीडिया को आड़ेहाथों लेते हुए उन्हें भाजपा का प्रवक्ता और कर्मचारी बता दिया। राहुल का ये गुस्सा इस बात का संकेत भी है कि जो बात वो कहते हैं वो प्रमुखता से नहीं आती। बहरहाल गुस्से के बदले संयम सही शब्दों के साथ अपनी बात को रखें क्योंकि वो नेता प्रतिपक्ष हैं। इस पद की एक गरिमा होती है। जय हिंद