गाजियाबाद के लाखों लोग राहत और आफत के बीच त्रिशंकु बन चुके हैं। एक तरफ अतिरिक्त ब्याज के नोटिस का दबाव है दूसरी तरफ मेयर का रोज-रोज का आश्वासन। रामनवमी तक समस्या के समाधान का आश्वासन था, मगर अब तो चतुुर्थी भी आ गई। विषय है गाजियाबाद नगर निगम के बढ़े हुए हाउस टैक्स के मामले का। नगर निगम का फरमान था कि मार्च खत्म होते ही हाउस टैक्स पर 12 प्रतिशत का ब्याज वसूला जाएगा। उधर मेयर ने लखनऊ से ही बयान जारी कर दिया था कि शासन स्तर पर हाउस टैक्स की बढ़ी दरें वापस ले ली गईं हैं। लोगों ने शासनादेश की कॉपी मांगी तो कहा गया कि अगले आठ-दस दिन में लखनऊ से आदेश आ जाएगा। अब तो महीना बीतने को आ गया, लखनऊ से कोई सरसराहट भी दिखाई नहीं दे रही है। कुछ व्यापारिक संगठनों ने बढ़े हुए हाउस टैक्स के मामले को लेकर धरना शुरू किया, मगर मात्र आश्वासन पर उनकी भी आवाज दब गई। अब व्यापारिक संगठनों को भी बताना चाहिए कि उनको जो आश्वासन मिला था उसका हुआ क्या? लोगों ने एक अप्रैल से 12 प्रतिशत ब्याज लगने का दर्द उजागर किया तो मेयर का वही पुराना जवाब आया कि लोग टैक्स जमा ना करें। उन्होंने यह भी कहा कि कोई ब्याज भी नहीं लगेगा। मगर यह तो इस समस्या का कोई हल ही नहीं। समस्या का समधान तो शासन के आदेश पर टिका है। ऐसे में अगर नगर निगम के अधिकारी यह कहें कि शासन के आदेश के बिना वह ना कोई छूट देंगे ना ब्याज छोड़ेंगे तो वह कुछ गलत तो कह नहीं रहे। हालात यह हो चुके हैं कि अब लोग मेयर की बात मानकर टैक्स जमा नहीं करें तो नगर निगम के नोटिस का डर है और जमा करें तो कमर टूटती है। मेयर का आश्वासन देखते हैं तो राहत नजर आती है, नगर निगम की कार्रवाई को देखें तो आफत दिखाई देती है। नगर निगम का हाउस टैक्स जमा करें तो भी परेशानी, ना जमा करें तो भी परेशानी। राहत का आश्वासन मेयर दे रही हैं तो उनको लखनऊ संपर्क कर पता करना चाहिए कि जो शासनादेश आठ-दस दिन में आ जाना चाहिए था, वह अटक कहां गया। क्योंकि उसके बिना तो कुछ भी होना संभव ही नहीं है। अब यह गाजियाबाद के लोगों का विवेक है कि वह मेयर के आश्वासन पर डिगे रहते हैं या नगर निगम के दबाव में आते हैं।