चर्चा-ए-आम
ये कौन दिशा जा रहा है हमारा भारत। हम सार्वजनिक मंचों से जो कह रहे हैं और जिसके सपने हम देश के नागरिकों को दिखा रहे हैं कि हमारा भारत जल्द ही दुनिया की एक बड़ी आर्थिक ताकत बनकर विश्व गुरु बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन वास्तविकता जो नजर आ रही है वो हमारे इस सियासी आश्चासन में हमारे विश्वास को बनाने में ना केवल बाधा डाल रही है बल्कि उसे खंडित भी कर रही है। अपने सियासी आश्वासनों में हम यह कहते नहीं थकते कि हमारे राजनीतिक प्रयास देश के सभी लोगों को एकसाथ लेकर चलने के हैं जिसमें सबका विश्वास हो, सबका सहयोग हो, सबका साथ हो, सबका विकास हो और देश में आपसी सौहार्द, स्नेह और समन्वय की भावना जुड़ी हो। क्या ऐसा हमें कहीं भी होता नजर आ रहा है। हम पिछले कई सालों से देश की राजनीति का मुख्य आधार हिन्दू-मुसलमान के बीच धार्मिक उन्माद पैदा करके अपने वोट बैंक को साधने के प्रयासों में जुटे नजर आ रहे हैं। अपने इन नफरती प्रयासों में हमने क्या-क्या कुछ नहीं कहा है, यहां तक कि देश के कई जिम्मेदार सियासी नेताओं ने जिनमें कई मंत्री पद पर भी आसीन हैं उन्होंने भी समय-समय पर जहर उगलकर देश के सांप्रदायिक माहौल को बिगाडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शेष पृष्ठ तीन पर
एक केन्द्रीय मंत्री कहते हैं कि अगर कोई मुसलमान आपको एक थप्पड़ मारे तो आप पलटकर उसे सौ थप्पड़ मारें। महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ मंत्री सार्वजनिक भाषण में बोलते हैं कि अब समय आ गया है कि हमें मस्जिदों में घुसकर उन्हें सबक सिखाना होगा।
देश के शीर्ष नेता खुद से कई बार कह चुके हैं कि ये लोग आपके घरों में घुसकर, आपके मंगलसूत्र उठा ले जाएंगे और आपकी मां-बहनों की इज्जत पर भी हमला करेंगे। अभी हाल में आसाम के मुख्यमंत्री ने एक शर्मनाक वीडियो जारी कर सभी हदें पार कर दी, उन्होंने स्वयं अपने हाथ में एक बंदूक दिखाकर एक ऐसे पोस्टर पर निशाने लगाए जिसमें टोपी पहने और दाड़ी वाले दो मुस्लिम चेहरे छापे गए थे। पिछले कई सालों से देश में धार्मिक उन्माद फैलाने के प्रयास जब बहुत अधिक सफल होते नजर नहीं आए तो व्यवस्था से जुड़े सत्ताधारियों ने जातिवाद का नया नफरती बीज देश की नौजवान पीढ़ी के दिमाग में डालने की कोशिश की। बिना राय मशविरे के यूजीसी का एक नये बिल की अचानक घोषणा कर दी, इस घोषणा के साथ ही देशभर के विश्वविद्यालयों में पड़ रहे 48 लाख से भी अधिक विद्यार्थियों के बीच एक तीव्र प्रतिक्रिया हुई और देखते ही देखते कुछ ही घंटों में देश का हिन्दू समाज भी अगड़े-पिछड़े के नाम पर दो हिस्सों में बंटता नजर आया। ऐसा पहली बार हुआ कि जिस सत्ता व्यवस्था ने अपना राजनीतिक आधार धार्मिक उन्माद बनाया था उसने साथ ही जातिवाद के मतभेद की दिवार साथ-साथ खड़ी कर दी। अब ये जातीय मतभेद का नफरती उन्माद कब और कहां जाकर ठहरेगा और देश को कितना नुकसान पहुंचाएगा यह समय ही बताएगा। इस सियासी नफरत के प्रयासों का प्रारंभिक असर हमें उत्तर प्रदेश में अभी से खुलकर देखने को मिल गया है।
उत्तर प्रदेश सदन के बीच जो कार्यवाही पिछले दिनों चली उसमें जातीय मतभेद का यह असर शीर्ष नेताओं के भाषणों में नजर आने लगा। गत दिनों प्रयागराज में माघ मेला के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ शासन-प्रशासन ने जो अपमानजनक कार्रवाई की और वो देश में चर्चा का विषय बनी उसे लेकर भी उत्तर प्रदेश में भाजपा का नेतृत्व स्पष्ट तौर पर दो हिस्सों में बंटता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शंकराचार्य को लेकर जो कुछ भी बोला उनके दो सहयोगी उपमुख्यमंत्रियों ब्रजेश पाठक व केशव प्रसाद मौर्या ने एकदम ही विपरीत दिशा ले ली और वो मुख्यमंत्री द्वारा लिए गए राजनीतिक स्टैंड के खिलाफ खड़े होकर शंकराचार्य के समर्थक बन गए और लगभग स्पष्ट भाषा में ये संकेत दे दिए कि योगी सरकार ने माघ मेले के दौरान शंकराचार्य के सम्मान के विरुद्ध जो भी किया वो महापाप था और उसके लिए दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण समाज जो पहले से ही खुलकर योगी सरकार के खिलाफ खड़ा था उसके साथ प्रदेश का ठाकुर समाज भी यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सडक़ों पर उतरकर ब्राह्मण समाज का सहयोगी बन गया है। लेकिन शायद भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व ब्राह्मणों और ठाकुरों की नाराजगी को दरकिनार कर एससी/एसटी और ओबीसी मतदाताओं को साधने के प्रयासों को प्राथमिकता दे रहा है, इसके अलावा भी मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा चलाए जा रहे एसआईआर के अभियान के विरुद्ध कांग्रेस, सपा और टीएमसी ने जो जंग छेड़ी हुई है उसे लेकर भी देश का सियासी माहौल बिगड़ा हुआ है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जिस दिन देश की शांति, भाईचारे और सौहार्द पर कोई ना कोई गहरी सियासी चोट ना पहुंचाई जा रही हो। ऐसे में देश का हर बुद्धिजीवी नागरिक यह सोचने पर मजबूर है कि हमारा भारत देश किस दिशा जा रहा है और क्या ऐसे माहौल के चलते हम कभी विश्व गुरु बनने की कल्पना को साकार होता देख पाएंगे। कौन दोषी है हमें तय करना होगा वरना देश आगे आने वाले कुछ ही समय में एक गहरे संकट का शिकार भी हो सकता है।