२२ मार्च को दिल्ली के मावलंकर हॉल में केसी त्यागी के कार्यक्रम में लोगों का हुजुम उमड़ा तो कई तरह की चर्चाएं चल निकलीं। हालांकि अभी कयासों की राजनीति ज्यादा चल रही है। मगर एक चर्चा ऐसी है जिसने सभी का ध्यान खींचा है। इस चर्चा में सवाल है कि क्या गाजियाबाद में ऐसे और भी नेता हैं जो अपने नाम पर हजारों की भीड़ जुटा सकते हैं। क्योंकि पूर्व सांसद ने तो अपना जनाधार दिखा ही दिया है। मावलंकर हॉल में उमड़े जनसमुदाय को लेकर चर्चा इसलिए भी है क्योंकि केसी त्यागी अब ना तो किसी पद पर थे और ना ही किसी संगठन में। संगठन के नाम पर भीड़ जुटाना फिर भी आसान है। मावलंकर हॉल में जो हजारों लोग आए वह केसी त्यागी की खुद की पूंजी है। तो मूल सवाल पर आते हैं कि क्या गाजियाबाद में व्यक्तिगत जनाधार वाले नेता अभी भी हैं? पूर्व में तो गाजियाबाद में ऐसे अनेक नेता हुए हैं। इस सवाल का जवाब जानने के लिए थोड़ा पीछे के समय मेे जाना होगा। कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा ने जनवरी में लिट्टी चोखा की दावत अपने विधानसभा क्षेत्र में की थी। यह भी किसी संगठन का कार्यक्रम नहीं था। यह नितांत व्यक्तिगत कार्यक्रम था जिसमें हजारों लोग जुटे थे। इससे साफ हो गया था कि कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा के पास व्यक्तिगत जनाधार है। इस कड़ी में लोनी के पूर्व चेयरमैन मनोज धामा का नाम लेना भी जरूरी है। मनोज धामा ने बिना संगठन की सहायता लिए होली मिलन कार्यक्रम किया। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि मनोज धामा के कार्यक्रम में लोनी ही नहीं आसपास के कई जिलों के लोग पहुंचे थे। वहीं से मनोज धामा के कद का अंदाजा लगाया जा सकता है। भाजपा हो या कोई दल जितने भी जनप्रतिनिधि हैं उनमें से अधिकांश के पास जो भीड़ है वह संगठन की वजह से है। लेकिन असली नेता वही है जिसके पास अपने व्यक्तिगत लोग हैं। नेता की असली ताकत यही है।