चाहे गाजियाबाद विकास प्राधिकरण का क्षेत्र हो या फिर आवास विकास परिषद का, बिना अधिकारियों की मिली भगत के अवैध निर्माण नहीं हो सकता। प्रवर्तन विभाग के लोग खुद ही अवैध निर्माण को प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि इससे उन्हें मोटी कमाई होती है। हकीकत यह है कि बिना मिली भगत के एक ईंट भी अवैध रूप से नहीं रखी जा सकती।
इसका ज्वलंत उदाहरण है राजेंद्र नगर सेक्टर 2, 3 और 5, जब प्राधिकरण उपाध्यक्ष अतुल वत्स थे तो उनके समय में किसी बिल्डर की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह अवैध मंजिल का निर्माण कर सके। उनका तबादला होते ही प्रवर्तन विभाग के लोगों ने अवैध मंजिल का निर्माण बिल्डरों से करवा दिया। मोटा खेल करके प्रवर्तन विभाग के यह लोग अपना ट्रांसफर करा कर चले गए। अब आप खुद सोचो क्या किसी की हिम्मत है कि वह अपने आप अवैध मंजिल का निर्माण कर लेगा। अगर अधिकारी सख्त होंगे तो किसी की हिम्मत नहीं कि वह अवैध रूप से फ्लैट या दुकानों का निर्माण कर सके।
मेरठ में आवासीय इलाके में जो व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हुई वह आवास विकास परिषद के अधिकारियों की मिली भगत का ही नतीजा है। अगर समय रहते ही लोगों को रोक दिया जाता तो आज यह नौबत नहीं आती। गाजियाबाद में भी बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण हो रखा है अवैध रूप से फ्लैट बने हुए हैं दुकान बनी हुई है जिस दिन यहां के मामले कोर्ट में चले गए तो मेरठ जैसी कार्रवाई गाजियाबाद में भी होना निश्चित है। उस समय सिर्फ और सिर्फ उन लोगों का नुकसान होगा जिन्होंने यह अवैध फ्लैट और दुकान खरीदी है। सर्वोच्च न्यायालय ने मेरठ के मामले में जो आदेश जारी किया है उस पर उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि यह पूरे देश के लिए चेतावनी है। अब इस चेतावनी को प्राधिकरण और परिषद के अफसर को गंभीरता से लेना चाहिए। क्योंकि अब भी अवैध निर्माण जारी रहा तो आने वाले समय में अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने आदेश में प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही को माना है। अधिकारी भी मानकर चलें कि वे भी बच नहीं सकेंगे। साथ ही लोगों को भी अब बहुत जागरूक होने की जरूरत है। प्रॉपर्टी खरीदने से पहले उसकी पूरी जांच कर ले कि वह नियम अनुसार बनी है या नहीं। वरना यह मान के चलें आज नहीं तो कल अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई होनी ही है।