अफसरों के बच्चे भी पढ़ें सरकारी स्कूलों में
किसी भी दल की सरकार रही हो कभी भी सरकार ने ये अनिवार्य नहीं किया कि अफसरों के बच्चे जिसमें डीएम एसएसपी भी शामिल हो, सरकारी स्कूल में पढ़ेंगे। यदि ये अनिवार्य कर दिया जाए तो सरकारी स्कूलों की हालत भी सुधरेगी और प्राइवेट स्कूलों पर कार्रवाई करने के लिए प्रशासन देर भी नहीं लगायेगा। आज स्थिति ये है कि प्राइवेट स्कूल मनमानी फीस लेते हैं और उन पर किसी का भी कोई अंकुश नहीं होता। यही कारण है कि प्राइवेट स्कूलों के संचालक जो चाहते हैं वो करते हैं। इतना ही नहीं जो किताबें होती है वो भी स्कूल से ही खरीदी जाएंगी, ड्रेस भी स्कूलों द्वारा बताये गये स्थान से ही लिया जाएगा। किसी भी प्रशासनिक या पुलिस अफसर के पास कोई शिकायत लेकर जाता है तो कोई कार्रवाई नहीं होती क्योंकि किसी अफसर के बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं, किसी का कोई पारिवारिक सदस्य वहां काम करता है। इसलिए अफसर चाहकर भी कार्रवाई नहीं करता है। अभी शहर के एक स्कूल द्वारा मनमानी तरीके से स्कूल का टाइम बदल दिया गया। तमाम अभिभावक इस गंभीर समस्या को लेकर प्रशासन के पास पहुंचे लेकिन वहां कोई सुनवाई नहीं हुई। प्रशासन के बड़े अफसरों ने साफ तौर पर कह दिया कि प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ हम कोई कारवाई नहीं कर सकते। अब सवाल पैदा होता है कि परेशान अभिभावक किसके पास जाएं। इसलिए सरकार को चाहिए कि वो ये अनिवार्य करे कि सरकारी अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़ेंगे ताकि फिर कार्रवाई में हिचकिचाहट ना और आम जनता को राहत भी मिले। स्थिति ये है कि कोई भी चाहे राजनेता है या बड़ा अफसर हो उसका एक सटीक जवाब होता है कि फलां स्कूल का संचालक हमारी बात नहीं सुनता। आखिरकार ऐसा कैसे चल सकता है। जवाबदेही तो तय होनी चाहिए। जय हिंद