गाजियाबाद (युग करवट)। २० साल तक बिहार में सत्ता में रहकर एक अलग स्थान बनाने वाले नीतीश कुमार रातों रात खबरों से दूर हो जाएंगे, बिहार से दूर कर दिये जाएंगे ऐसा शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा। चार महीने पहले जिस व्यक्ति ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली हो। चार महीने बाद ही उसे दिल्ली का रास्ता दिखाया जा रहा हो ऐसा भी पहले कभी नहीं हुआ।
राजनीति में नीतीश कुमार एक ऐसा नाम था जिस पर लोग भरोसा करते थे। राजनीतिक समीक्षकों का कहना था कि नीतीश कुमार एक ऐसा राजनेता थे जो देश के प्रधानमंत्री पद के भी दावेदार थे। जब इंडिया गठबंधन बना था तब इसी बात को लेकर सब एकजुट हुए थे कि नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए। लेकिन विपक्ष के दांत भी हाथी वाले निकले जो अंदर से कुछ और बाहर से कुछ और उम्मीदवार तो दूर उन्हें संयोजक तक नहीं बनाया गया। दूर अंदेशी की राजनीति करने वाली भाजपा को तभी आभास हो गया था कि विपक्ष अगर एकजुट होता है तो नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के विकल्प हो सकते हैं। तब राजनीति बदली और नीतीश कुमार भाजपा के साथ आ गये। बस यहीं से नीतीश कुमार अंदर-अंदर भाजपा को खटकने लगे। बिहार में नीतीश के बिना सबकुछ बेकार है ये अहसास भाजपा को अच्छी तरह था इसी वजह से विधानसभा का चुनाव भी लड़ा और फिर बिहार में सरकार भी बना दी। सत्ता से दूर रहने वाली भाजपा इस बार की विधानसभा चुनाव में पहले नंबर की पार्टी बन गई। 20 साल में कभी भी बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं रहा। इसका कारण नीतीश कुमार ही है। क्योंकि उनका बिहार में एक अलग ही जलवा है।
नीतीश कुमार ने बिहार में लालू यादव और उनके परिवार को भी आगे बढऩे नहीं दिया और वहीं भाजपा के सांप्रदायिक सोच को भी आगे नहीं बढऩे दिया। नीतीश कुमार बिहार में सभी धर्म और जाति के लोगों की पहली पसंद थे। कुर्मी समाज में उनका जिस तरह से एकतरफा राज रहा वो सभी के सामने है। लेकिन अब बिहार में नीतीश कुमार कांधे के बल पर भाजपा 20 साल बाद बिहार में बड़े भाई की भूमिका में आने के बाद अपना मुख्यमंत्री बनाने जा रही है। हैरत की बात ये है कि नीतीश कुमार की विदाई जिस तरह हुई उसकी उम्मीद नहीं थी। वो खबरों से भी गायब है। छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर टीवी चैनल डिबेट करते हैं लेकिन राजनीति के एक ऐसे व्यक्तित्व की रातोंरात भूमिका बदल गई लेकिन किसी चैनल पर अब कोई डिबेट नहीं हो रही। जाहिर है कि कहीं ना कहीं रिमोट चल रहा है। नीतीश के बेटे निशांत जदयू में शामिल हो गये हैं। वहीं बिहार में जनता दल यू के तमाम नेता खामोश हैं और उनके यहां मातम जैसा माहौल है। लेकिन सब खामोश हैं क्योंकि खामोशी ही आज की राजनीति में अहम भूमिका निभा रही है।