अमेरिका इजराइल और ईरान के बीच चल रहे घमासान के चलते पैदा हुए गैस के संकट से अपने मुल्क में भी हाहाकार मचना शुरू हो गया है। इसी हाहाकार में लोग बाग ढूंढ ढूंढ कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह वीडियो एक दूसरे को भेज रहे हैं जिसमें कई साल पहले वे नाले की गैस से चाय बनाने की बात कर रहे थे। सोशल मीडिया को तो जैसे मसाला ही मिल गया है और एक से बढ़ कर एक मीम्स और चुटकुले मोदी जी के उस बयान पर बन रहे हैं। विपक्षी दल भी जैसे इसे ले उड़े हैं और सडक़ से संसद तक उन पर तंज कस रहे हैं। ऐसे में यह सवाल वाकई मौजू हो चला है कि क्या वाकई नाले की गैस से चाय बन सकती है अथवा अपनी आदत के अनुरूप मोदी जी ने यूं ही आयें बायें बोल दिया था? यह भी तो किसी से नहीं छुपा है कि अपनी बात को वजनी बनाने के लिए मोदी जी अक्सर ऐसी बातें, संस्मरण अथवा अवैज्ञानिक तथ्य परोस देते हैं, जो सत्य के करीब कतई नहीं होते और इनसे उनकी जग हंसाई ही होती है। ऐसी बातों अथवा दावों की विस्तृत चर्चा करने की बजाय मुझे यह उपयोगी जान पड़ता है कि इस बात की खोज खबर ली जाए कि क्या वाकई नाले की गैस से चाय बन सकती है और यदि हां तो कैसे? नाले की गैस संबंधी मोदी जी के इस संस्मरण का क्या कोई वैज्ञानिक आधार है और यदि है तो क्यों नहीं इस दिशा में हम आगे बढ़ते? यदि सचमुच ऐसे प्रयोग हो रहे हैं तो देश में कहां-कहां अब तक ऐसा हुआ है? आइए आज इसी विषय की पड़ताल करते हैं ।
सबसे पहले तो हमें यह समझना जरूरी है कि नालों, सीवरों और जैविक कचरे में सडऩ की प्रक्रिया के दौरान कई प्रकार की गैसें उत्पन्न होती हैं। जैविक पदार्थ ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जब सड़ते हैं, तो इस प्रक्रिया को एनेरोबिक डाइजेशन कहा जाता है। इस प्रक्रिया से जो गैस बनती है, वही बायोगैस होती है। इस बायोगैस में मुख्य रूप से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड होती हैं, जबकि थोड़ी सी मात्रा में हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें भी पाई जाती हैं। इनमें से केवल मीथेन ही एक ज्वलनशील गैस है और यह चूल्हा जलाने, बिजली बनाने या वाहनों के ईंधन के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है। इसी वैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर दुनिया भर में बायोगैस संयंत्र लगाए गए हैं। हम भारतीय भी जान चुके हैं कि यदि किसी जगह पर्याप्त मात्रा में जैविक कचरा या सीवर का अपशिष्ट उपलब्ध हो, तो उससे बनने वाली गैस को इक_ा करके ऊर्जा में बदला जा सकता है। शायद इसी तथ्य को आधार बना कर मोदी जी ने नाले की गैस का उपयोग ऊर्जा के रूप में करते हुए देखने का दावा किया होगा ।
यक्ष प्रश्न फिर वही है कि क्या वास्तव में किसी नाले में पाइप डालकर सीधे उसकी गैस से चाय बनाई जा सकती है? विज्ञान कहता है कि सिद्धांत रूप से यदि किसी स्थान पर पर्याप्त मात्रा में मीथेन इक_ा हो रही हो और उसे पाइप के माध्यम से बाहर निकाला जा सके तो यह संभव है मगर यह केवल सिद्धांत भर है । नालों में बनने वाली गैस की मात्रा स्थिर नहीं होती, उसमें जहरीली गैसें भी मिल सकती हैं और बिना किसी बाहरी नियंत्रण के उसे जलाने का कोई तरीका नहीं है। हां यदि आधुनिक तकनीक में गैस को नालों से नियंत्रित टैंकों और संयंत्रों में इक_ा कर तमाम गैसों को अलग किया जाए तो यह संभव है। मगर यह तो कोई नई बात नहीं है। भारत में कई शहर ऐसे हैं जहाँ सीवर और कचरे से बनने वाली गैस को व्यवस्थित तरीके से ऊर्जा में बदला जा रहा है। दिल्ली के रिठाला सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में सीवर के अपशिष्ट से बनने वाली गैस का उपयोग तो बिजली उत्पादन के लिए भी किया जा रहा है। इसी तरह गुजरात के सूरत शहर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाली गैस से बिजली बना कर नगर निगम अपने बिजली खर्च में कटौती कर पा रहा है। लखनऊ में भरवारा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में गैस को शुद्ध करके ऐसे प्रयोग हो रहे हैं तो गुरुग्राम के धनवापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में भी इसी प्रकार की परियोजना पर काम चल रहा है। उधर, इंदौर में शहर के गीले कचरे से बायो-सीएनजी बनाने का बड़ा संयंत्र भी बखूबी काम कर रहा है और उसकी गैस से नगर निगम की बसें तक चल रही हैं। मगर यह सभी महती कार्य केवल वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से ही संभव हुए हैं और मोदी जी के अपने निजी अनुभव के अतिरिक्त कहीं भी नाले की गैस के सीधे ईंधन के रूप में प्रयोग का कोई अन्य उदाहरण नजर नहीं आता। बेशक उन्होंने जो कहा वह वैज्ञानिक रूप से असंभव के दायरे में नहीं आता मगर ऐसा होता हुआ कहीं देखा भी नहीं जाता क्योंकि नाले में मीथेन के अतिरिक्त मौजूद अन्य गैसें विस्फोटक हो सकती हैं तथा नाले से मीथेन भी एक बहाव में नहीं होती जिससे कोई चूल्हा लगातार थोड़ी देर भी जल सके। अब आप स्वयं ही फैसला कीजिए कि मोदी के नाले की गैस वाले बयान पर आपको भी ऐसे मीम्स पर चटकारे लेने हैं अथवा मोदी जी के पक्ष में और मजबूती से खड़ा होना है?