मैं कोई इतिहासकार तो नहीं मगर जितना कुछ पढ़ा सुना अथवा देख पा रहा हूं , उसके आधार पर यह शर्तिया कह सकता हूं कि दुनिया बस एक ही सिद्धांत पर चलती है जिसे गोस्वामी तुलसी दास ने ‘समरथ को नहि दोष गोसाईं’ कहा था। अपनी बात की तस्दीक करने के लिए मुझे कुछ विशेष करने की जरूरत नहीं है। बस सुबह के अखबार ही काफी हैं। दो धींग देश मिल कर एक तीसरे देश को बमों और मिसाइलों से न केवल धुआं धुआं कर देते हैं अपितु उसके सर्वोच्च नेता और उसके पूरे परिवार की भी हत्या कर देते हैं मगर पूरी दुनिया खामोशी से तमाशा देखती रहती है और कहीं कोई तूफान नहीं उठता । हो सकता है कि खामनेई कोई बुरा नेता हो और उससे ईरान की जनता भी त्रस्त हो मगर मेरे घर के झगड़े में आप डंडा लेकर आ जाएं, यह कौन सा नियम है ? अब किसी को नहीं पता कि इजराइल अमेरिका बनाम ईरान की लड़ाई लंबी खिंचेगी अथवा यहीं खत्म हो जाएगी मगर यह तो एक बार फिर तय हो गया है कि युगों बाद भी इंसानी दुनिया दबंगों के ही हवाले है और वही सब दोहरा रही है जो पिछले हजारों सालों से वह करती आई है । ‘जो ज्यादा ताकतवर, वही सही’ का अनौपचारिक सिद्धांत पुन: प्रतिपादित हो चुका है और लगता नहीं कि आगे भी यही सब नहीं दोहराया जाने वाला है।
इतिहास का पन्ना पलटिए तो पाएँगे कि दबंगों का यह सिलसिला उतना ही पुराना है जितना कि मानवीय इतिहास है। सत्य की जीत और मजलूमों को न्याय केवल पौराणिक कथाओं और मिथकों तक ही सिमटा नजर आता है । वास्तविक दुनिया के तो अलग ही उसूल हैं। सिकंदर जब दुनिया जीतने निकला था तो उसने कहां किसी अंतरराष्ट्रीय मंच से अनुमति ली थी ? वह तो बस चलता गया, जीतता गया, और जिनकी हार हुई, वे उसकी प्रशंसा करने लगे। दिमागी दिवालियापन की इंतहा देखिए कि अपने अहंकार की तुष्टि के लिए जिसने दुनिया भर के लाखों निर्दोष लोगों को मार डाला, उसे अपनी स्कूली बच्चों को हम ‘महान’ कह कर आज भी पढ़ाते हैं। बाद में रोमन साम्राज्य आया । उनका तरीका भी वही था जो ट्रंप जैसे लोग आज अपनाते हैं ‘हम सभ्यता फैलाने और आपको सभ्य बनाने आए हैं’। मध्यकाल में मंगोलों का नाम सुनते ही शहरों के दरवाजे खुद खुल जाते थे। कोई बहस नहीं, कोई प्रस्ताव नहीं । बस घोड़े दौड़ते थे और इतिहास लिखा जाता था। जिसने जितने अधिक जुल्म किए वह उतना अधिक महान कहलाया। उस समय भी दुनिया में बहुत से छोटे मोटे शासक थे, पर वे वही सब करते थे जो आज के छोटे देश करते हैं । गहरी साँस लेते, चुप रहते और उम्मीद करते कि तूफान उनकी सीमा पार कर जाएगा । औपनिवेशिक युग तो दबंगई का जैसे स्वर्णकाल ही था । यूरोपीय शक्तियाँ जहाज लेकर निकलीं, नए महाद्वीप खोजे और फिर उनपर अपने नाम भी लिख दिए। किसी से पूछने की भी आवश्यकता नहीं। भारत जैसे विशाल देश ने तो दो सौ वर्षों तक जलालत भरी गुलामी झेली। उस दौर में भी बाकी दुनिया की तरह हमारे राजा महाराजा यही सोचते रहे ‘चुप रहो, शायद हमारे हिस्से की मुसीबत टल जाए।’ बीसवीं सदी आई तो लगा कि दुनिया ने कुछ सीखा होगा। लेकिन विश्व युद्धों ने साबित कर दिया कि इंसान तकनीक में आगे बढ़ा है, समझदारी में नहीं। युद्ध खत्म होने के बाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ बनीं, नियम बने, चार्टर बने और सबने राहत की साँस ली कि अब ताकतवर मनमानी नहीं करेंगे। लेकिन धीरे-धीरे सबको समझ आ गया कि नियम भी वही माना जाता है, जिसे मानने में धींग देशों का फायदा होता है । अपने मुल्क की बात करें तो हम भी कहां बदले हैं। हम आज भी कड़ी निंदा, गहरी चिंता, रणनीतिक संयम जैसे शब्द वैश्विक राजनीति की चाय में इलायची की तरह डाले जाते हैं। हमे इसी में स्वाद आता है और खुद को तसल्ली देते हैं कि हमारे वश में इससे अधिक है ही क्या ? यही नहीं वक्त के साथ हमारी बेशर्मी भी बढ़ती जाती है और दुनिया के बड़े कसाइयों के पक्ष में हम ?ीठो की तरह खड़े होने में भी भी जरा नहीं लजाते। हां कथित संतुलित बयानों में जरूर हमारा कोई सानी नहीं। संतुलन भी ऐसा कि प्रतिक्रिया में हमारे शब्द तक नहीं बदलते । ‘हम स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।’ ‘हम शांति की अपील करते हैं।’ , ‘दोनों पक्ष संयम बरतें।’ वगैरह वगैरह । गद्दीनशीं लोगों की छोड़िए जनता जनार्दन भी कहां बदली है। पहले लोग चौपाल में चर्चा करते थे, अब सोशल मीडिया पर करते हैं। पहले भी यही कह कर चुप हो जाते थे ‘यह ठीक नहीं हुआ।” और अब भी लिख कर ‘यह बहुत गलत है’ शांत हो जाते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले यह चर्चा चाय के साथ होती थी, अब वाई-फाई के साथ होती है। लीजिए मैने तो अपने तईं चर्चा का आगाज भी कर दिया । अब आप भी कुछ कह सुन लीजिए । होना हवाना तो खैर हमसे क्या ही है ।