कितना तकलीफ देय कि एक तरफ तो भाजपा और सरकार देश से जातिवाद समाप्त करने की बात कर रही थी, दूसरी तरफ एक कानून में संशोधन करके समाज को बंटवारे की आग में झोंक दिया गया। आज एक प्रमोद यादव सोशल मीडिया पर लिखते हैं कि वह यूजीसी संशोधन का समर्थन करते हैं। तो दूसरी तरफ करण शर्मा यूजीसी संशोधन को वापस लेने की बात कह रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों एक ही पार्टी में हैं। मुझे नहीं लगता कि मंडल आयोग के मामले में भी समाज में अलगाव की इतनी आग भडक़ी होगी। कुछ समय पहले तक नारे लग रहे थे कि जात-पात करो विदाई, हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई। ना कोई दूरी ना कोई खाई, हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई। दलित, पिछड़ो और सवर्णों को हिन्दुत्व के लिए एक किया जा रहा था, मगर यूजीसी कानून को लागू कर एक झटके में समाज को जाति के बंधन में जकड़ कर दिया गया। समझ तो यह नहीं आता कि जो भाजपा पूरे हिन्दू समाज को एकजुट करने निकली थी, उसी ने इस बांटने वाले संशोधन को लागू कैसे हो जाने दिया। भाजपा के कर्ता-धर्ता आखिर यह कैसे भूल गए कि जिस सवर्ण समाज को कानूनन निशाने पर लिया गया वह समाज उसका कैडर है। बिना जांच के किसी को जेल भेज देने वाले कई कानून इसी सरकार से समाप्त किए थे, फिर छात्रों का भविष्य केवल शिकायत के आधार पर अंधकारमय बना देने के कानून को क्यों मान्यता दी गई।
क्या इस यूजीसी कानून से छात्रकाल ही में बच्चों के मन में जातिवाद का जहर घर नहीं कर जाएगा। आंदोलन के लिए आज सवर्ण समाज बाध्यकारी है तो यह अर्नगल नहीं है। जिसको चोट लगेगी वह दर्द को महसूस भी करेगा और चिल्लाएगा भी। यूजीसी किसी भी दृष्टिकोण से हितकारी नहीं है। यह विघटनकारी है। इससे भाजपा को राजनीतिक नुकसान भी उठाना ही पड़ेगा। यह तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का कि उसने इस कानून पर फिलहाल रोक लगा दी है।