मन में हसरत बड़ी है कि पार्टी से विधानसभा का टिकट मिल जाए। मगर नेता जी का मन है घर से निकलने के लिए करता ही नहीं। केवल समाजवादी पार्टी ही नहीं बल्कि बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस में भी ऐसे नेताओं की लंबी लिस्ट है जो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में टिकट की आस पाले बैठे हैं। गाहे बगाहे पार्टी कार्यालय का चक्कर भी लगा आते हैं। यदा कदा पार्टी के कार्यक्रम में भी नजर आ जाते हैं। मगर चुनाव लडऩे के लिए जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, उसके पास तक जाने का नेताजी का कोई कार्यक्रम नहीं होता। मैं जिस महत्वपूर्ण चीज की बात कर रहा हूं उसे राजनीतिक भाषा में पार्टी का कार्यकर्ता कहते हैं। साथ ही क्षेत्र के कुछ सम्मानित नागरिक भी होते हैं जो चुनाव में काफी हद तक मदद करते हैं। चुनाव में बूथ पर बैठने वाले कार्यकर्ताओं की बड़ी जरूरत होती है। अन्यथा चुनाव लड़ चुके किसी भी व्यक्ति से पूछ लिजिए कि जब किसी बूथ पर उसका बस्ता नहीं दिखता तो लगता कैसा है। इस दर्द को केवल वही बता सकता है। आज सपा, बसपा व कांग्रेस में टिकट की चाह रखने वालों को अपना अधिकतम समय क्षेत्र में गुजारन चाहिए। ताकि टिकट मिल जाए तो लोग यह ना पूछें कि किसे टिकट दे दिया। पिछले विधानसभा चुनाव में गाजियाबाद की शहर विधानसभा सीट पर ऐसा प्रयोग समाजवादी पार्टी को भारी पड़ गया था। पश्चिम उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर गैर भाजपाई दल नए व्यक्ति को टिकट देने का नजीता भुगत चुके हैं। शायद इसीलिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव बार-बार कह रहे हैं कि इस बार प्रत्याशी का चयन बड़ी गहनता से किया जाएगा। जो लोग चुनाव लडऩे की इच्छा रखते हैं उनको गली गली जाकर लोगों से मिलना शुरू कर देना चाहिए। अपनी पार्टी के कार्यकर्ता से बूथवार जाकर मुलाकात करनी चाहिए। जब टिकट की लालसा रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति क्षेत्र में सक्रिय हो जाएगा तो पार्टी को मजबूती मिलेगी ही। फिर पार्टी चाहे किसी को टिकट दे, उसे कार्यकर्ता तो मिल ही जाएगा। भाजपा को मैं इस मामले अलग इस लिए रख रहा हूं क्योंकि भाजपा तो पहले से ही काम को कर रही है।