बिना जांच के आरोप को अपराध मान लेना असंवैधानिक है। यूजीसी के नए प्रारूप में यही तो वह बिन्दू है जिस पर आपत्ति है। भारतीय संविधान की मूल आत्मा ही यही है कि चाहे सौ गुनहगार छूट जाएं मगर किसी एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। फिर यूजीसी के नए कानून को बनाते समय इस बात को नजरअंदाज क्यों कर दिया गया। अगर यूजीसी कमेटी ने इसे बनाया भी तो सरकार ने इस संशोधन को लागू करते समय इस बिन्दू को हटाया क्यों नहीं। बात अगर सुप्रीम कोर्ट ही है तो सर्वोच्च अदालत ने इस पर रोक लगाई है खत्म नहीं किया है। अभी सुनवाई चलेगी, पता नहीं क्या निर्णय आए। अगर सवर्ण समाज अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित है तो उसकी चिंता अनर्गल नहीं है। क्या सरकार इस बात से इंकार करेगी कि यूजीसी को लकर पूरे देश में समाज में विघटन नहीं हुआ है? कहीं यूजीसी के विरोध में तो कहीं समर्थन में रोज आंदोलन नहीं हो रहे हैं? क्या इससे हिन्दू एकजुट हो पाएगा। भाजपा के वह जनप्रतिनिधि, वह नेता, वह कार्यकर्ता असहज हैं जो सवर्ण समाज से आते हैं। अपनी झेंप मिटाने के लिए वह केवल इतना ही कह पाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट जो तय करेगा वह मान्य होगा। मगर कोई यह नहीं कह पा रहा है कि हम प्रधानमंत्री के सामने जाकर विरोध दर्ज कराएंगे। भारत में विडंबना देखिए कि एक दलित महिला राष्टï्रपति है, पिछड़े वर्ग से आने वाले मोदी प्रधानमंत्री हैं। उसके बावजूद भी अगर लगता है कि इन दोनों वर्गों का ही उत्पीडऩ हो सकता है, तो फिर कौन सी दैविक शक्ति इन्हें बचा पाएगी? शायद ही दुनिया में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण मिले कि सत्ता पर काबिज व्यक्ति की जाति पीडि़त है। जहां तक गाजियाबाद की बात है तो यहां यूजीसी को लेकर दो स्थानों पर अनशन चल रहा है। राजनगर में डाक्टर उदिता त्यागी अपने आवास के बाहर अनशन पर हैं तो डासना मंदिर में महंत और महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरी अनशन कर रहे हैं। चलिए मान लेते हैं कि कई स्थानों पर यति के भाषण भाजपा जनप्रतिनिधियों एवं नेताओं को असहज कर देते हैं। इसलिए यति के साथ आने में उन्हें हिचक होती है, फिर चाहे यति सही बात को लेकर ही क्यों ना बैठे हों। मगर डाक्टर उदिता के लिए भाजपा के नेता और जनप्रतिनिधि क्या कहेंगे? उदिता पर तो किसी तरह की हेट स्पीच या भडक़ाऊ बात कहने का आरोप नहीं है। उदिता तो भाजपा की पदाधिकारी भी हैं। वह तो सवर्ण समाज के बच्चों के सुरक्षित भविष्य की बात पर अनशन कर रही हैं। क्या गाजियाबाद के सांसद अतुल गर्ग, कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा, विधायक अजितपाल त्यागी, विधायक संजीव शर्मा, एमएलसी दिनेश गोयल को जनता को यह नहीं बताना चाहिए कि वह डाक्टर उदिता त्यागी के साथ हैं या खिलाफ? मेरी एक गुजारिश और है कि मेरे इस आज के लेख को संभालकर रख लिजिएगा, यह आने वाले चुनाव में सवाल पूछने के काम आएगा।