हाउस टैक्स का मामला
हाउस टैक्स को लेकर एक साल से जो रस्साकशी चल रही है वो आज भी जस की तस है। 7 मार्च को बोर्ड बैठक में जो कुछ हुआ वो सब एक गणित का खेल बन गया। जनता आंकड़ों में फंस गई। कोई भी तस्वीर साफ नहीं है। टैक्स कम हुआ, नहीं हुआ क्या जमा करना है क्या नहीं करना है, कोई 77 प्रतिशत टैक्स कम का दावा कर रहा है, कोई 40 प्रतिशत छूट का दावा कर रहा है, लेकिन कागजों में कुछ नहीं है। सबकुछ बयानों तक ही चल रहा है। किसी को अफसरों का डर है तो किसी को किसी और जनप्रतिनिधि का, पार्षद भी अब टैक्स को लेकर अलग-अलग गुट में नजर आ रहे हैं। कोई भी पार्षद जनता के साथ खड़ा दिखाई नहीं दे रहा है। सबकी बातों में और दावों में विरोधाभास है। हालांकि एक पार्षद ने जरूर हिम्मत की और जोश में इस्तीफा दे दिया। बोर्ड से पहले भाजपा के कई पार्षदों ने कहा था कि इस बार टैक्स को लेकर हम कोई समझौता नहीं करेंगे। ईंट से ईंट बजा देंगे और जरूरी हुआ तो इस्तीफा भी दे देंगे। लेकिन सब बोर्ड की बैठक में तमाशाई बने रहे। तीसरी आंख ने देखा कि जो बादल गरज रहे थे वो बोर्ड की बैठक में बिल्कुल नहीं बरसे। बोर्ड की बैठक में क्या निर्णय हुआ है, जनता को क्या लाभ मिला है इसको लेकर तस्वीर साफ होना बहुत जरूरी है। महापौर श्रीमती सुनीता दयाल जो पहले दिन से जनता के साथ खड़ी हैं। उन्हें प्रेक्टिकल तौर पर सामने आकर मीडिया के माध्यम से जनता को बताना होगा कि बोर्ड बैठक में क्या फैसला हुआ है और किस तरह आगे टैक्स जमा करना है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में निगम के बड़े अधिकारियों की मौजूदगी भी होना चाहिए क्योंकि अभी तक तो पार्षदों ने अपने-अपने तरीके से फेसबुक या सोशल मीडिया के माध्यम से अपने नंबर बढ़ाते हुए टैक्स के बारे में जानकारी दी है लेकिन अधिकारिक तौर पर अभी कोई भी ऐसा बयान मेयर या निगम के अधिकारियों की ओर से नहीं आया है कि सात मार्च की बोर्ड बैठक में जनता को क्या लाभ मिला। जय हिंद