सामूहिक भोज, इस शब्द को पढऩे-सुनने से ही एक सुखद अनुभूति हो जाती है। यह भारत की एक बहुत समृद्घ और प्रभावशाली परंपरा रही है। इस शब्द से ही प्रतीत हो जाता है कि इसमें लोग सामूहिक अर्थात एक ही स्थान पर एक ही साथ बैठकर भोजन करते हैं।
इसमें ना ऊंच-नीच का फर्क होता है ना छुआछूत की कोई भावना। मतलब भेदभाव के लिए कोई जगह ही नहीं बचती। प्राचीन समय में गुरूकुल परंपरा में सामूहिक भोज का उल्लेख मिलता है। आधुनिक भारत में स्कूलों में छात्र-छात्राएं इस परंपरा को निभाते आए। पंजाब में सांझा चुल्हा इसी सामुहिक भोज परंपरा का ही हिस्सा रहा है। पुराने समय में गांवों में लोग खेत पर, महिलाएं घरों पर सामूहिक भोज की परंपरा को निभाते आए। धीरे-धीरे समय बदला, अब स्कूलों में बच्चे अपना-अपना टिफन लेकर अलग बैठते हैं। जबकि सामूहिक भोज की विशेषता यह थी कि अगर कोई बच्चा घर से किसी कारण से भोजन नहीं भी ला पाया तो उसे सहजता से खाना मिल जाता था। ना किसी को पता चलता था ना किसी को हीन भावना होती थी। अब स्कूलों में सामूहिक भोज लगभग समाप्त ही हो गया है। पहले कहीं कहीं सरकारी कार्यालयों में भी साथ बैठकर खाने की परंपरा निभाई जाती थी, अब वहां भी यह सब बहुत कम होता है। हां पुलिस विभाग में जरूर बड़े खाने के आयोजन अभी हो रहे हैं। राजनीतिक स्तर पर भी पहले सामूहिक भोज का बड़ा महत्व रहता था। अब नेताओं ने भी इससे दूरी बना रखी है। गाजियाबाद में तो कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा ने ही लिट्टी चोखा जैसे आयोजन कर सामूहिक भोज को बरकरार रखा है। पहले नगर निगम और नगर पालिका स्तर पर भी ऐसे आयोजन हो जाया करते थे। अपने पार्षद रहने के दौरान हिमांशु लव ने भी सामूहिक भोज की ही तरह के कार्यक्रम कराए थे। अब कार्यकारिणी उपाध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने सामूहिक भोज का आयोजन किया। जिसमें स्थानीय गणमान्य लोगों के साथ नगर निगम के कर्मचारियों को भी आमंत्रित किया गया। कुल मिलाकर बात यह है कि जो परंपराएं समाज हित में हैं उनको निभाते रहना चाहिए।