हाउस टैक्स का मामला
जब से नगर निगम बना है तब से गाजियाबाद की जनता हर नगर निगम के हर चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत दे रही है। हर बार निगम में भाजपा का मेयर बनता आ रहा है। सवाल ये उठता है कि क्या नगर निगम में जनता ने भाजपा को इसलिए बहुमत दिया था कि उसके ऊपर बेतहाशा हाउस टैक्स लागू कर दिया जाए। उत्तर प्रदेश में जहां-जहां निगम है वहां आज तक इतना टैक्स नहीं बढ़ा है। मेरठ में भी कभी इतना टैक्स नहीं बढ़ा। 20 से 25 प्रतिशत टैक्स बढ़ता रहा है क्योंकि जनता के टैक्स से ही कर्मचारियों के वेतन का भुगतान होता है, सडक़ों का निर्माण होता है, विकास कार्य होते हैं और लोगों को 20 से 25 प्रतिशत हर साल टैक्स बढ़ोतरी से कोई परेशानी भी नहीं होती। सवाल ये पैदा होता है कि हाईकोर्ट ने टैक्स को लेकर कोई भी निर्णय नहीं दिया है। उसने केवल बढ़े हुए टैक्स को लेकर जो याचिका दायर की गई थी उसे खारिज किया है। अदालत ने निगम द्वारा जो तथ्य सामने रखे थे उसे सही माना है। वहीं अब एकबार फिर गेंद जनप्रतिनिधियों के खाते में आ गई है। खासकर अब सबकुछ दारमदार जनप्रतिनिधियों के ऊपर है क्योंकि वो जनता की प्रतिनिधि हैं और निगम की मुखिया हैं। निगम एक्ट में सारे अधिकार उनको हैं। अधिकारियों का काम तो केवल उसका पालन करना है। जब हाईकोर्ट ने टैक्स को लेकर कोई डायरेक्शन नहीं दी है तो क्या अब 30 जून 2025 को बोर्ड की बैठक में मेयर द्वारा जनता के हितों का ख्याल रखते हुए जो बढ़ा हुआ टैक्स था उस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से रद्द कर दिया था और सभी करदाताओं से अपील भी की थी कि वो कोई भी बढ़ा हुआ टैक्स जमा ना करें। इस बैठक में मंत्री, सांसद और विधायक भी शामिल हुए थे। जाहिर है अब इन पर भी जवाबदेही बनती है। जिस तरह से अधिकारी अब कह रहे हैं कि टैक्स वसूली होगी, नोटिस जारी होंगे, पार्ट पेमेंट माना नहीं जाएगा तो फिर जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि वे आपसी खींचतान को दूर करते हुए एक साथ बैठकर जनता के हितों का ध्यान रखते हुए कोई बीच का रास्ता निकाले जिससे जनता पर भी बोझ ना पड़े और राजस्व की हानि भी ना हो। जय हिंद