समझ नहीं आ रहा कि हम स्वयं को ‘विश्वगुरु’ किस आधार पर कहते रहते हैं? क्यों इस मामले में मोदी जी और मोहन भागवत जी का आत्मविश्वास इतना है कि जैसे बस अगला संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र हमारे प्रवचन से ही शुरू होगा? क्यों दावे कुछ ऐसे हैं जैसे दुनिया के सारे विवाद अब हमारी पंचतंत्र जैसी कहानियों से ही सुलझाए जाएंगे? लफ्फाजी भी कुछ ऐसी जैसे कथा वाचन का ठेका हमारे पास ही है और दुनिया वही सुनेगी जो हम सुनाएंगे मगर यह क्या हुआ? ताज़ा हालात देखकर तो लगता है कि गुरुजी क्लास लेने आए ही नहीं और बच्चे पड़ोसी स्कूल में ट्यूशन पढऩे चले गए । दुनिया देख रही है कि धरती के बड़े फैसलों में से एक की बिसात अब पाकिस्तान में बिछ रही है और हम दूर खड़े अपनी ही विदेश नीति का पोस्टमार्टम देख रहे हैं। बेशक ईरान और अमेरिका इजराइल के बीच कोई भी समझौता अभी दूर की कौड़ी है मगर ताज़ा हालात से हमारी कूटनीति की जो चाट पकौड़ी बनी, उसकी गवाही देना किसी भी भारतीय के लिए किसी यातना से कम है क्या?
ईरान अमेरिका और इजऱाइल जैसे जटिल समीकरणों के बीच जो दुनिया में कूटनीतिक शतरंज शुरू हुई है उसमें अचानक पाकिस्तान की एंट्री ने सबको चौंका दिया है। जिस देश को हम अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग बताते नहीं थकते थे, वही अब बातचीत का मंच बनता नजर आ रहा है और मोदी सरकार की तमाम कूटनीतिक विफलताओं के चलते भारत को कोई टके सेर भी नहीं पूछ रहा । जिस पाकिस्तान को हम हर दूसरे दिन ‘असफल राज्य’ घोषित करते हैं, वही आज अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की चौपाल सजाकर बैठा है। ईरान, इजऱाइल और अमेरिका जैसे देशों के बीच बातचीत की आंच वहीं सुलग रही है और 140 करोड़ लोगों का भारत इस पूरी प्रक्रिया में कहीं नहीं है। न मेजबान, न मध्यस्थ और न ही कोई अन्य महत्वपूर्ण भूमिका। बेशक विदेश नीति कभी नारेबाज़ी का विषय नहीं होती। यकीनन यह एक सतत, संतुलित और बेहद सूक्ष्म कला है मगर इस दिशा में हमनें क्या किया? आखिर क्या कारण रहा कि ‘हम इजऱाइल के साथ हैं’ कहने में हमनें जितनी ऊर्जा लगाई उतनी ही ऊर्जा ‘हम ईरान के भी मित्र हैं’ कहने में नहीं दिखाई? क्यों इजराइल से दोस्ती का ढिंढोरा पीटकर और अमेरिका का पिछलग्गू बन कर अपनी निष्पक्षता की छवि मिट्टी में मिलवाई? नतीजा सामने है और एक पुराने और भरोसेमंद रिश्ते में दरारें पड़ गईं और नए रिश्ते भी उतने मजबूत नहीं बन पाए जितनी उम्मीद थी। बेशक अमेरिका से नजदीकी रखना बुरा नहीं, इजऱाइल के साथ सहयोग बढ़ाना भी गलत नहीं, लेकिन सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में हमने अपनी पारंपरिक संतुलन नीति को क्यों खो दिया? क्यों हम इतने उत्साहित हो गए कि पुराने मित्रों की भावनाओं को ही नजरअंदाज कर बैठे? और अब जब दुनिया के बड़े खिलाड़ी बातचीत की मेज सजा रहे हैं तो भारत की कुर्सी खाली नजर आती है। क्या यह वही भारत है जो कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अगुआ था, जो शांति वार्ताओं का स्वाभाविक मंच माना जाता था? आज वही भारत दर्शक दीर्घा में बैठा हुआ है, कभी ताली बजाता हुआ, कभी सिर हिलाता हुआ। आखिर हमें कब समझ आयेगा कि कूटनीति में संतुलन नाम की भी कोई चीज़ होती है। यह किसी टीवी डिबेट जैसी होती है क्या? हमने कैसे सोच लिया कि अंतरराष्ट्रीय संबंध भी व्हाट्सऐप गु्रप की तरह चलते हैं, जिसे चाहा ऐड कर लिया, जिसे चाहा म्यूट कर दिया। लेकिन असल दुनिया में ‘म्यूट’ किया गया देश कभी-कभी पूरी बातचीत को ही कहीं और शिफ्ट कर देता है, जो अब हो रहा है। इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक रहस्यमय रही बड़ी बड़ी घटनाओं पर भी भारत की खामोशी। आमतौर पर हर मुद्दे पर मुखर रहने वाले मोदी और उनकी टीम इस बार जैसे मौन ही साधे बैठी रही। न कोई तीखा बयान, न कोई बड़ा कूटनीतिक संकेत। यह खामोशी क्या रणनीतिक थी या असमंजस की प्रतीक, यह समझना थोड़ा मुश्किल है। दुनिया जानती है कि भारत की ताकत कम नहीं हैं। आर्थिक क्षमता, सामरिक स्थिति और वैश्विक स्वीकार्यता, सब कुछ तो है हमारे पास । बस जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हम अपनी विदेश नीति को फिर से गंभीरता, संतुलन और निरंतरता के साथ देखें। हमें यह समझना होगा कि कूटनीति ट्विटर ट्रेंड से नहीं चलती। न ही यह केवल भावनात्मक नारों पर टिकती है। यह रिश्तों की बारीक बुनाई है, जहाँ हर धागा मायने रखता है, पुराने भी, नए भी। शायद यही समय है कि हम ‘विश्वगुरु’ होने का दावा करने से पहले हम विश्व का एक विश्वसनीय, संतुलित और परिपक्व भागीदार बनने पर ध्यान दें। क्योंकि गुरु वही बन सकता है जिसमें शिष्य की तरह सीखने की विनम्रता हो न कि झूठा दंभ। चाय-पकौड़ी जैसी बहसों के सिद्धहस्त हमारे नेताओं को अभी सीखना होगा कि लफ्फाजी से निकलकर असली कूटनीतिक मेज तक कैसे पहुंचा जाए।