शासन के इरादे मजबूत हों या मुख्यमंत्री के कड़े निर्देश, मगर ये यूपी पुलिस है, यहां वही होता है जो पुलिस करना चाहती है। अन्यथा गाजियाबाद में पुलिस शिकायत सुनने के बजाए क्रिकेट मैच ना देख रही होती और कासगंज में शिकायतकर्ता का गिरेबान पकडक़र धक्का ना दिया जाता। दोनों घटनाएं वहां के अधिकारियों पर सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर उनकी व्यवस्था कैसी है। गाजियाबाद में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था लागू है। यहां के नंदग्राम थाने का एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो बनाने और पोस्ट करने वाले का दावा है कि थाने में पुलिसकर्मी क्रिकेट मैच देखने में इतने व्यस्त थे कि किसी की शिकायत लेने की सुध ही नहीं थी। शिकायतकर्ता अपनी शिकायत लेकर थाने में भटकता रहा मगर पुलिकर्मियों ने क्रिकेट मैच के अपने आनंद में जरा भी रुकावट नहीं आने दी। यह तब है जब शासन के स्पष्टï आदेश हैं कि हर शिकायतकर्ता की बात सुनी जाए। गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर ने ऐसी व्यवस्था बना रखी है कि हर थाने पर शिकायत लेकर आने वाले की शिकायत भी गंभीरता से सुनी जाएगी और उसके बैठने, पानी आदि की भी व्यवस्था करनी होगी। नंदग्राम थाने की इस वीडियो को देखने के बाद गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को समझ में आ गया होगा कि यहां थाना स्तर पर कैसी पुलिसिंग हो रही है। अब इस पर क्या एक्शन लिया जाएगा यह देखना होगा। दूसरी घटना कासगंज की है। यहां एक व्यक्ति समाधान दिवस में अपनी समस्या लेकर आया। कासगंज कोतवाली प्रभारी ना जाने किस बात पर नाराज हो गए और पीडि़त को कालर से पकड़ कर धक्के मारते ले गए। इतना ही नहीं उसे चार घंटे तक थाने में बिठाए रखा। उसको अपनी जमानत तक करानी पड़ी। अगर पीडि़त अपनी समस्या को अधिकारी से कह भी नहीं सकता तो बंद कर दिजिए समाधान दिवस जैसे कार्यक्रम। जनता का उत्पीडऩ करने के लिए समाधान दिवस की जरूरत ही नहीं है, वह तो ऐसे भी किया जा सकता है। दोनो घटनाएं पुलिस की उस वर्षों पुरानी कार्यप्रधाली को दर्शाती है जिस योगी खत्म कर चुके थे।