पिछले साल के जुलाई महीने से गाजियाबाद में नगर निगम के हाउस टैक्स को लेकर जद्दोजहद चल रही है। गाजियाबाद नगर निगम बोर्ड के निर्णय को अधिकारियों ने नहीं माना, पूर्व पार्षद हाईकोर्ट चले गए। तकरीब आठ महीने तब चली सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। अब सवाल यह है कि क्या नगर निगम अभी भी बोर्ड के निर्णय को मान्यता नहीं देगा? अगर ऐसा ही है तो नगर निगम बोर्ड की अहमियत ही क्या रह गई है? मेयर सुनीता दयाल तभी से कहे जा रही हैं कि जनता पर बोझ नहीं बढऩे दिया जाएगा, मगर कैसे यह आज तक नहीं बताया। बोर्ड बैठक में जो विधायक, मंत्री, सांसद मौजूद थे और नई दरों को निरस्त करने का समर्थन कर रहे थे, अब उनका कोई अता पता नहीं है। अब उनका स्टैंड क्या है, यह भी नहीं पता। जो पता है वह यह है कि नगर निगम बढ़ी दरों से ही टैक्स वसूल रहा था और आगे भी वही करने वाला है। रही बात जनता की तो यहां तो भाई, लोग घर बैठकर बात बनाएंगे, नेताओं को कोसेंगे, भाजपा का भला बुरा कहेंगे और कहानी खत्म। कुछ प्रतिशत लोग रोएंगे और बाकी सब टैक्स जमा कर देंगे। जनता के प्रति किसी की जवाबदेही रहेगी ही नहीं। चुनाव में कुछ लोग जनता को टैक्स की बात दिलाएंगे, जनता क्या फैसला लेगी वो तो वही जाने। पूर्व मंत्री बालेश्वर त्यागी ने नगर निगम के हाउस टैक्स को लेकर एक बहुत बढिय़ा बात कही। नगर निगम के हाउस टैक्स मामले पर प्रतिक्रिया देने की बात पर उन्होंने अजहर इकबाल की कुछ लाइनों को सामने किया। उन्होंने लिखा कि- इतना संगीन पाप कौन करे? मेरे दुख पर विलाप कौन करे, चेतना मर चुकी है लोगों की, पाप पर पश्चताप कौन करे? सभी जानते हैं कि बोर्ड बैठक में बढ़े हाउस टैक्स का विरोध करने वाले कुछ पार्षद कैसे बाद में अधिकारियों की गोद में बैठ गए थे। जिनके पास बढ़ी हुई दर से टैक्स चुकाने के लिए अथाह धन है उनको तो कोई फर्क पड़ता नहीं है और जिन पर असल में बोझ पड़ेगा, जिनकी कमर टूट जाएगी उनकी कोई सुनेगा नहीं।