अपने समय के महान संत कबीरदास ने जीवन, दर्शन, सामाजिक मूल्यों पर बहुत कुछ लिखा भी है और सामाजिक बुराइयों पर कटाक्ष कर आलोचना भी की। मगर हम आज के परिपेक्ष में देखें तो क्या पाते हैं कि वर्तमान में उन्होंने अपनी उन बातों को कहा होता तो हाल सलीम वास्तिक जैसा हो जाता। अपनी कुछ बातों के लिए तो उनको बहुत ही पछतावा हुआ होता। जैसे कि कबीरदास ने लिखा कि निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। उनका कहना था कि जो भी व्यक्ति हमारी निंदा या आलोचना करता है, उसे हमेशा पास रखना चाहिए। संभव हो तो अपने आंगन में ही उसके लिए कुटिया बनवा देनी चाहिए। क्योंकि वह निंदक हमारी कमियों को बताकर हमारे स्वभाव को बिना पानी औा साबुन के ही साफ और शुद्घ कर देता है। उसकी आलोचना को सुनकर हम अपनी गलतियों को सुधार सकते हैं।
अब आप ही बताइये कि आज के समय में कोई है जो अपनी निंदा बर्दाश्त कर सकता है। आपका भी जवाब होगा कि संभत: ऐसा कोई नहीं होगा। सामान्य व्यक्ति को तो छोड़ ही दीजिए अब तो हमारे जनप्रतिनिधि और यहां तक कि सरकार भी अपनी निंदा या आलोचना पसंद ही नहीं करते। आप आज किसी जनप्रतिनिधि की आलोचना करके देखिए चाहे वह कितनी भी स्वस्थ आलोचना क्यों ना हो, आपको तत्काल परिणाम भुगतना पड़ेगा। सामाजिक जीवन जी रहे लोग, सामाजिक या स्वयंसेवी संस्थाएं चला रहे लोग भी अपनी निंदा या आलोचना स्वीकार नहीं करते। अब प्रचलन ऐसा हो गया है कि आलोचना या निंदा को लोग बुरा समझने लगे हैं। किसी की कमी बताकर तो देखिए ना झगड़ा हो जाए तो कहना। लोग अपनी आलोचना को बर्दाश्त कर ही नहीं पाते, नियरे रखने की बात तो छोड़ ही दीजिए। इसलिए लोग बुरा होता देखकर भी चुप्पी साध लेते हैं। सही भी है कि बेकार में झगड़ा मोल कोई ले भी क्यों। अब तो यह है कि निंदक दूर ही रहिए, रस्ते से हट जाए। बिन लाठी बिन तेल के भुर्ता देंगे बनाय। तो भाइयों अच्छा हुआ कि कबीरदास और गालिब जैसे लोग हमारे दौर में पैदा नहीं हुए।