हाउस टैक्स मुद्दा
गाजियाबाद(युग करवट)। भारतीय जनता पार्टी के पांच बार रहे पार्षद एवं पूर्व नेता तथा निगम में पार्षद दल के नेता रहे राजेंद्र त्यागी ने हाउस टैक्स बढ़ोत्तरी को लेकर सबसे पहले आवाज बुलंद की थी। अदालत जाने से पहले राजेंद्र त्यागी ने 1 जुलाई 2024 को यूपी के मुख्यमंत्री को पत्र द्वारा निगम की कार्यप्रणाली से अवगत कराया था। उन्होंने हाउस टैक्स के साथ-साथ निगम में कमीशन का मामला भी पत्र द्वारा मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाया था। मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में राजेंद्र त्यागी ने बताया था कि गाजियाबाद नगर निगम द्वारा सम्पत्ति कर नियमावली 2000 संशोधित एवं नगर निगम अधिनियम १९५९ की सुसंगत धाराओं के विपरीत जाकर हठपूर्वक सम्पत्ति करो में तीन से चार गुना वृृद्घि/प्रस्तावित किया जा रहा है। पत्र में बताया था कि निगम में वर्ष २००१ वर्ष २००२ से ही सदन द्वारा धारा १७४ (ख) के अन्तर्गत सम्पत्ति करो के निर्धारण के लिए किराये के रेट निर्धारित किये गये थे। उन्होंने बताया था कि प्रत्येक दो वर्ष के बाद हमेशा दस प्रतिशत की वृद्घि होती रही है। पत्र में बताया गया था कि निगम द्वारा नेहरूनगर स्थित ऑडिटोरियम और रमते रोड स्थित शॉपिंग कॉम्लेक्स पर 86 करोड़ रुपए खर्च किये गये लेकिन निगम ने डीएम सर्किल रेट आधारित किराये पर नहीं उठाया जा रहा है और आम जनता पर टैक्स का बोझ डाला जा रहा है। पत्र में बताया गया था कि ९ जनवरी २०२४ को निगम द्वारा सम्पत्ति करो में वृद्घि किये जाने के संबंध में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित कराई गई थी जो पूर्णरूप नियम विरूद्घ है। बार-बार बैठकें बुलाकर टैक्स बढ़ाने के प्रस्ताव रखे गये। वरिष्ठ भाजपा नेता राजेंद्र त्यागी ने पत्र में मुख्यमंत्री से मांग की थी कि आम नागरिकों पर नियम विरूद्घ जाकर सम्पत्ति करो में वृद्घि डीएम सर्किल रेट किराये पर वृद्घि नहीं होनी चाहिए। वर्तमान लागू सम्पत्ति करो को तीन से चार गुना बढ़ाया जाना किसी भी स्थिति में न्यायसंगत नहीं है। इसलिए सम्पत्ति करो में जायज वृद्घि के लिए धारा-174 (ख) में डीएम सर्किल रेट आधार को छोडक़र अन्य दो विकल्पों के आधार पर सम्पत्ति करो में वृद्घि के प्रस्ताव तैयार करके नियमानुसार प्रक्रिया पूरी करके सदन की स्वीकृति/अनुमति लेकर ही सम्पत्ति करो में वृद्घि करना ही तर्क संगत होगा। पत्र में आग्रह किया गया था कि गाजियाबाद नगर निगम के अधिकारियों को इस बारे में न्याय संगत कार्यवाही करने के लिए जनहित में आदेशित करने की कृपा की जाए। तथा तब तक पूर्व से लागू सम्पत्ति करो को ही जारी रखा जा जाए। २०२४ से ये आवाज राजेंद्र त्यागी उठा रहे हैं और जब कोई भी शासन और स्थानीय स्तर पर हल नहीं निकला तो फिर पूर्व पार्षदों ने अदालत जाने का निर्णय लिया। पूर्व पार्षद हिमांशु मित्तल इस मामले को लेकर हाईकोर्ट गये और एक लंबी लड़ाई इन लोगों ने लड़ी लेकिन वहां भी बार-बार सुनवाई को टाला जाता रहा और आखिरकार हाईकोर्ट ने इन पूर्व पार्षदों की याचिका खारिज कर दी। याचिका खारिज होने के बाद अब भाजपा के तमाम नेता और जनप्रतिनिधि जनता से माफी मांग रहे हैं। लेकिन इतने लंबे समय में इन जनप्रतिनिधियों ने क्यों ऐसा प्रयास नहीं किया कि मामला अदालत से पहले ही निपट जाता।