अखिलेश यादव की रैली
समाजवादी पार्टी के राष्टï्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कल दादरी में २०२७ के विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया। कल की रैली में जिस तरह लोगों का हुजूम दिखाई दिया वो अपने आप में एक बड़ा संदेश है। दरअसल पीडीए के नाम पर रैली बुलाने का फैसला कई माह पहले सपा राष्टï्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने लिया था और उसके बाद एक बड़ी सभा करने की तैयारी की गई थी। एक माह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस रैली को लेकर समाजवादी पार्टी के कई बड़े नेता अलग-अलग जनसम्पर्क कर रहे थे लेकिन अहम भूमिका में राजकुमार भाटी ही रहे। दरअसल, दादरी में रैली करने के पीछे भी बहुत बड़ी रणनीति रही है। गुर्जर समाज भी कहीं ना कहीं अंदरखाने भाजपा सरकार में या संगठन में अहम जिम्मेदारी नहीं मिलने से नाराज चल रहा था। गुर्जर समाज प्रदेश के 142 विधानसभा सीटों पर अपनी भूमिका निभाता है। वो 40 से 50 सीटें ऐसी हैं जिसमें गुर्जर समाज निर्णायक भूमिका में रहता है। यदि गुर्जर समाज को नजरअंदाज कर दिया जाए तो 40 से 50 सीटों का नुकसान किसी भी दल को हो सकता है। इसी कारण दादरी में ये सभा रखकर आसपास के गुर्जर समाज को जोडऩे का प्रयास है। तीसरी आंख ने देखा कि भाजपा के कुछ गुर्जर नेता जो अंदरखाने नाराज दिखाई दे रहे थे उन्होंने भी अखिलेश यादव की रैली में पर्दे के पीछे रहकर अपने समाज के लोगों से रैली में पहुंचने की अपील की। कुछ ने बसों का भी इंतजाम कराया। कुछ गुर्जर समाज के नेताओं ने जो भाजपा में हैं नाम ना छापने की शर्त पर कहा कि अगर दादरी की रैली में गुर्जर समाज की भूमिका नहीं रहेगी तो फिर अन्य दल और खासकर भाजपा उन्हें क्यों भाव देगी। बात अखिलेश यादव की नहीं है बात गुर्जर समाज के स्वाभिमान की भी है। इसलिए रैली को सफल बनाना भी जरूरी था। बहरहाल, कल की रैली अपने आप में एक बड़ा संदेश दे गई है। हालांकि रैलियों में आने वाली भीड़ इस बात का पक्का सबूत नहीं होती कि वो वोटों में तब्दील होगी लेकिन संदेश दूर तक जाता है। क्योंकि जो दिखता है वही बिकता है। अभी हाल ही में भाजपा की कई रैलियां हुई लेकिन उसमें पहले जैसी भीड़ नहीं जुट पाई थी यही कारण था कि प्रधानमंत्री की नोएडा में होने वाली जनसभा को लेकर भाजपा हाईकमान पिछले एक माह से लगातार जनसम्पर्क कर रही थी। विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा के बाद समाजवादी पार्टी ही एक ऐसा दल है जो पूरी तरह से चुनाव में उतर चुकी है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के बाद सपा ही एक ऐसा दल है जो पूरी मुस्तैदी के साथ भाजपा को करारा जवाब देने के लिए डटा है। राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि लोकतंत्र के लिए ये ठीक नहीं है कि केवल दो दल ही आमने सामने हो। चार बार बसपा की सरकार रही लेकिन आज बसपा की जो स्थिति है वो ठीक नहीं है। देश में 50 साल से ज्यादा सत्ता में रहने वाली कांगे्रस भी आज उत्तर प्रदेश में बैसाखियों की तलाश में है। जय हिंद