नई दिल्ली। हमलोग यानी इंसान। वैज्ञानिक भाषा में होमो सेपियंस। इंसान आबादी बढ़ाने में एक्सपर्ट हैं। 100 करोड़ से 200 करोड़ तक पहुंचने में 125 साल लगे। लेकिन 700 से 800 करोड़ पहुंचने में सिर्फ 12 साल। 15 नवंबर 2022 को दुनिया भर में इंसानों की आबादी 800 करोड़ पार कर जाएगी। संयुक्त राष्ट्र इस सतत विकास का श्रेय विज्ञान, तकनीकी, इनोवेशन, लंबी उम्र और सेहतमंद जीवन को दे रहा है। इंसानों की आबादी के बढऩे का दर पिछले कुछ दशकों से गिरा है, लेकिन इसके बावजूद 2037 तक हमारी आबादी 900 करोड़ और 2058 तक 1000 करोड़ हो जाएगी। यह अनुमान यूएन डेसा की वल्र्ड पॉपुलेशन प्रॉसपेक्ट्स 2022 की रिपोर्ट में लगाया गया है। संयुक्त राष्ट्र के पापुलेशन फंड की प्रमुख नटालिया कानेम ने कहा कि यह इंसानियत के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। क्योंकि अब मांओं और बच्चों की मौत कम होती है।
नटालिया कहती हैं कि मुझे इंसानों की बढ़ती संख्या से कोई डर नहीं है। डर इस बात का है कि इससे संसाधनों की खपत तेजी से बढ़ेगी। चिंता इस बात की सभी देशों को करनी चाहिए। खासतौर से उन देशों को जहां पर प्रजनन दर ज्यादा हैं। कई लोग इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। रॉकफेलर यूनवर्सिटी की लेबोरेटरी ऑफ पॉपुलेशन के जोएल कोहेन कहते हैं कि क्या मैं धरती पर अतिरिक्त हूं? धरती हम इंसानों का बोझ कैसे सहेगी। इसके दो पक्ष हैं- पहला प्राकृतिक सीमाएं और इंसानों के पास मौजूद विकल्प। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया के जिन आठ देशों में सबसे तेजी से आबादी बढ़ेगी, वो हैं- कॉन्गो, मिस्र, इथियोपिया, भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, फिलिपींस और तंजानिया। 2050 तक जो भी जनसंख्या बढ़ रही है, उसमें आधे से ज्यादा योगदान अफ्रीका के सब-सहारन देशों का रहेगा। ऐसा नहीं है कि भारत पीछे रहेगा इस मामले में। अच्छी बात ये है कि अगर दुनिया में हर कोई भारतीय नागरिक की तरह रहे तो उसे हर साल सिर्फ 0.8 धरती की जरुरत पड़े। लेकिन अमेरिकी नागरिक की तरह रहेगा तो उसे साल में पांच पृथ्वी की जरुरत होगी। यानी भारत में संसाधनों का इस्तेमाल कम हो रहा है अमेरिका की तुलना में।