डॉ. फादर कामिल बुल्के ने कहा था संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है।…लेकिन आज हिंदुस्तान में मां संस्कृत उपेक्षा की अंधी कोठरी में पड़ी कराह रही है, गृहिणी हिंदी उत्पीडऩ का शिकार हो सिसक रही है और नौकरानी अंग्रेजी रानी बनकर उन तक को अपना गुलाम बना रही है जो हिंदी की रोटी खाते हैं जिनके चूल्हे हिंदी के ईंधन से जलते हैं।
क्या यह राष्ट्रीय शर्म का विषय नहीं है कि हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है जहां कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो। अंग्रेज विद्वान वाल्टर चेनिंग ने कहा है कि विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। …और हमारे यहां तो राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के बदले उसे देश निकाला देने के प्रयास होते दिखाई पड़ते हैं। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में अंग्रेजी का वर्चस्व प्रगट होने लगा है। क्या हिंदी की उपेक्षा कर और अंग्रेजी को सिर पर चढ़ाकर अनमोल सांस्कृतिक विरासत वाला हिंदुस्तान पराई संस्कृति की दासता स्वीकार करने का पाप नहीं कर रहा है?
हिंदुस्तान के हर कोने में हिंदी समझने वाले मौजूद हैं। हिंदी फिल्में देखकर मनोरंजन करने वाले लोगों का हिंदी विरोध हास्यास्पद है। आजकल तो तमाम हिंदी के समाचार पत्र जमकर अंग्रेजी के रोमन शब्दों का प्रयोग कर देश की भाषा को अपमानित करने का काम कर रहे हैं। हिंग्लिश ने हिंदी का मज़ाक बनाकर रख छोड़ा है।
इस सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा कि हिंदी के उत्थान के प्रति किसी भी स्तर पर कोई गंभीर प्रयास नहीं हो रहे हैं। अब तो कवि सम्मेलनों के मंच से भी हिंदी की धज्जियां उड़ती देखी जा सकती हैं।
हिंदी में प्रत्येक भाव को सहजता से अभिव्यक्त करने की सुविधा है। हिंदी में हर रिश्ते के लिए अलग शब्द हैं, अंग्रेजी में ऐसा नहीं है।
डॉ. श्यामसुंदर दास का यह प्रश्न विचारणीय है – क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं, जहां बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो।…यह केवल हिंदुस्तान में ही संभव है।
हिंदी की रोटी खाने वालों और हिंदी को चाहने वालों को एकजुट होकर राजभाषा हिंदी के उत्थान का संकल्प आज के दिन लेना चाहिए, बशर्ते वे अपने बच्चों को ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार… सिखाने में व्यस्त ना हों।
एक समय था जब बिहार के प्रत्येक व्यक्ति ने ‘रामचरितमानस’ पढऩे के लिए हिंदी सीखी थी। प्रयास और इच्छाशक्ति से सब कुछ संभव है। हिंदी सीखने में, हिंदी बोलने में और हिंदी में कामकाज करने में शर्म नहीं गर्व का अनुभव करें।
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का यह कथन विचारणीय है…
कैसे निज सोए भाग को कोई सकता है जगा,
जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहीं उर में उगा।