गाजियाबाद में पहले मेयर-पार्षदों और पुलिस के बीच विवाद हुआ। धरने प्रदर्शन हुए, आंदोलन की चेतावनी दी गई। अब बताया जा रहा है कि विधायकों ने पुलिस कमिश्नरेट के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। यहां भी विरोधाभास है। पहले सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल होता है जिसमें सासंद अतुल गर्ग, मंत्री सुनील शर्मा, नरेन्द्र कश्यप, विधायक नंदकिशोर गूर्जर, धर्मेश तोमर, अजितपाल त्यागी दिखाई दे रहे हैं। दावा किया गया कि विधायको ने अपनी सुरक्षा एवं गाजियाबाद की कानून व्यवस्था को लेकर नाराजगी जताई है और पूरे मामले से मुख्यमंत्री को अवगत कराने की बात कही गई। लेकिन विधायकों के बयान छपे कि यह कोई बैठक नहीं थी बल्कि सामान्य तौर पर आपस में बैठे थे। उधर विधायक नंदकिशोर गूर्जर एक पत्र वायरल हो गया जिसमें गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट पर कई गंभीर आरोप लगाए गए। यहां सवाल कई हैं जैसे कि जनप्रतिनिधियों की चाय पार्टी में कोई बाहर का व्यक्ति तो था नहीं, तो उसके फोटो किसने वायरल किए। ऐसे फोटो वायरल करने के पीछे क्या उद्ेदश्य हो सकता है? अगर जनप्रतिनिधियों ने पुलिस कमिश्नरेट को लेकर बात नहीं की तो इस चर्चा को सार्वजनिक किसने और क्यों किया? यदि विधायक वाकई पुलिस कमिश्नरेट से नाराज हैं तो इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने से बचा क्यों जा रहा है? पुलिस ने बयान जारी कर कहा कि विधायकों को सुरक्षा शासन के आदेश के अनुरूप दी गई है तो फिर शिकायत स्थानीय सतर पर क्यों? सवाल पुलिस कमिश्नरेट से भी हैं कि आखिर पहले मेयर और पार्षदों से विवाद को क्यों बढ़ावा दिया गया। अब अगर जनप्रतिनिधियों को कोई दिक्कत परेशानी है तो उसे सामान्य बातचीत से दूर करने का प्रयास क्यों नहीं किया जा रहा है? क्यों पुलिस कमिश्नरेट भाजपा के जनप्रतिनिधियों से संवाद स्थापित नहीं कर पा रही है और विवाद को बढऩे दिया जा रहा है। सवाल यह है ही नहीं कि जनप्रतिनिधियों और पुलिस कमिश्नरेट में से कौन सही है कौन गलत। बात यह है कि विवाद बढऩे ही क्यों दिया जा रहा है?