आजकल एक अजीब सा माहौल है जहां बैठों वहां एक ही चर्चा होती है कि भाई साहब महंगाई इतनी बढ़ गई है, अपराध भी कम नहीं है, कहीं कोई सुनवाई नहीं है, ना जाने क्या-क्या, साथ में यह भी कहा जाता है कि भाई साहब कोई बोल नहीं रहा है। जो बोलता है उसके खिलाफ कार्यवाही हो रही है। मतलब एक उदासी भरे लफ्जों में चर्चा हो रही है। हो सकता है कहीं ना कहीं इन चर्चाओं में कुछ दम हो, लेकिन पूरा माहौल ऐसा हो ऐसा नहीं लगता। एक तरह से बस माहौल बनाने का प्रयास भी हो सकता है। इन चर्चाओं के बाद मुझे एक शेर याद आ रहा है कि ‘जो हो रहा है उसे देखते रहो चुपचाप, यही सुकून से जीने की एक सूरत है’, लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए, खामोशी भी गलत है। क्योंकि हकीकत यह है कि गूंगों की कहानियां नहीं लिखी जाती। मुझे एक और शेर याद आ रहा है कि ‘इसलिए जिंदा हूं कि मैं बोल रहा हूं, दुनिया किसी गूंगे की कहानी नहीं लिखती’, लेकिन बोले, समझ के बोले कि क्या बोलना है ये बोलने से पहले सोचें। देश में भले ही इस बात की चर्चा फैलाई जा रही है कि बोलने पर पाबंदी है ऐसा नहीं है जज्बा होना चाहिए, लेकिन जज्बात पर कंट्रोल भी जरूरी है। यहां सभी को बोलने की इजाजत है, लेकिन उसका तरीका सही होना चाहिए। आज ये आरोप भी लग रहे हैं कि मीडिया एक तरफा अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है और वह चाहता है कि जिस तरह वह चाहे उस तरह आप सोचें यह बात भी सभी पर लागू नहीं होती। आज भी कुछ मीडिया घराने ऐसे हैं जो अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ निभा रहे हैं। दरअसल मैंने जो महसूस किया वह यही है कि एक ऐसा माहौल सरकारों के खिलाफ बना दिया है जैसे बोलने पर पाबंदी है। ऐसा नहीं है आज भी लोग अपनी बात आसानी से बोल रहे हैं। अगर बात रखने का तरीका ही गलत होगा तो फिर कार्यवाही तो बनती है। क्योंकि अफसोस इस बात का है कि हम देश से प्यार तो करते हैं, लेकिन इस देश के बारे में अच्छी बुरी बातें होती हैं या कुछ कमियां होती हैं उसका बवाल विदेशों में करते हैं और अपने ही देश को बयानों से बदनाम भी करते हैं। यह किस तरह का अपने देश से प्रेम है। सही बात कही जाएगी तो निसंदेह सुनी जाएगी। मैं वसीम बरेलवी साहब के इस शेर से अपनी बात खत्म करता हूं…
‘कौन सी बात कहां कही जाती है,
यह सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है’।
– जय हिन्द।