गाजियाबाद। रविवार को शिक्षक दिवस है। पूर्व राष्टï्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में हर साल यह दिवस मनाया जाता है। भले ही यह कहा जाए कि शिक्षकों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए कोई एक दिन को निश्चित नहीं किया जा सकता है, शिक्षकों के प्रति सम्मान का भाव हर दिन, हर पल होना चाहिए, लेकिन इस दिवस को मनाने के पीछे युवा पीढ़ी के व्यक्ति विकास और राष्टï्रनिर्माण के लिए शिक्षकों के योगदार को याद करना है।
नए परिवेश में शिक्षक और छात्रों के बीच संबंधों में भारी बदलाव आया है। इसी मसले पर युग करवट ने कई शिक्षक और शिष्यों से बात की। साहिबाबाद स्थित लाजपत राय डिग्री कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय दत्त कौशिक का मानना है कि समय केस साथ शिक्षक और शिष्यों के बीच संबंध और सामन्जस्य में भारी बदलाव आया है। यह समय की मांग भी है। समय के बदलाव के साथ सोच में भी बदलाव आया है। अब शिक्षा में व्यावसायिकरण ज्यादा हो गया है। अब शिक्षा को सेवा के रूप में नहीं बल्कि एक व्यवसाय के रूप में देखा जा रहा है।
जाने माने कवि व वरिष्ठ पत्रकार चेतन आनंद ने कहा कि उनके लिए गुरु डॉ. कुंअर बेचैन ही सबकुछ रहे हैं। जब से लेखनी में होश संभाला, तभी से उनके जीवन का लक्ष्य जाना। काव्य लेखनी की प्रेरणा उन्हीं से मिली। अगर किसी के जीवन में गुरु नहीं है तो उसका जीवन ही व्यर्थ कहा जाएगा। इस विषय पर मैं खुद को गर्वित महसूस करता हूं कि डॉ. कुंअर बेचैन जैसा गुरु का सानिध्य मिला। यह साल क्रूर कोरोना वायरस ने गुरु की छत्रछाया छीन ली। गुरु के बिना दिन कैसे बीतते हैं, यह अब जान रहा हूं।
शिक्षाविद् जे एल रैना का कहना है कि शिक्षक दिवस की प्रासंगिकता आज भी वहीं है जो तीस साल पहले हुआ करती थी। हालांकि इस दौरान काफी बदलाव आया है। आधुनिकीकरण की छाया हर जगह पड़ी है। शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। लेकिन आज भी युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण और राष्टï्र के चरित्र के निर्माण में शिक्षकों की सबसे ज्यादा भूमिका होती है।
जानी मानी शिक्षक व साहित्यकार डॉ रमा सिंह का कहना है कि शिक्षक दिवस को सिर्फ प्रतिकात्मक तरीके से मनाने का औचित्य नहीं है। इस दिवस की महत्त्ता किसी अन्य दिवस से कम नहीं है। अगर देश को विकास चाहिए तो देश को सुसंस्कृति और अनुशासित लोग भी चाहिए। यह काम एक शिक्षक ही कर सकता है।