– सुब्रत भट्टाचार्य –
गाजियाबाद। राजनीति में अपनी भागेदारी बढ़ाने की मांग को लेकर रविवार को गाजियाबाद में वैश्य व्यापारी महाकुंभ का आयोजन किया गया। हालांकि शुरू से ही यह कहा जा रहा था कि यह आयोजन किसी एक दल का नहीं है, बल्कि सभी दलों से जुड़े वैश्य समाज के लोगों का है लेकिन मंच पर सिर्फ और सिर्फ भाजपा से जुड़े वैश्य समाज के नेता और कार्यकर्ता थे। सपा और बसपा से जुड़े वैश्य नेता मंच पर नहीं थे। ऐसे में इसे भाजपा से जुड़े वैश्य नेताओं की ओर से आयोजित सम्मेलन ही कहा जाना चाहिए। हालांकि मंच से कई लोगों ने कुछ ऐसी बातें कही, जो भाजपा के सिद्घांत और नीति से मेल नहीं खाती है। मंच से टिकट की दावेदारी भी की गई।
सम्मेलन के आयोजन से पूर्व कहा गया था कि मंच से वैश्य समाज की राजनीति में भागेदारी की मांग की जाएगी। मुख्य आयोजक राज्यसभा सांसद ने यह बात मंच से कही भी लेकिन मुख्य अतिथि केंद्रीय वाणिज्यमंत्री पीयूष गोयल ने इस पर कुछ भी नहीं कहा। बल्कि वैश्य समाज को छोटे रूप में देखने को गलत बताया। अपने 45 मिनट के भाषण में पीयूष गोयल ने एक बार भी नहीं कहा कि भाजपा ने वैश्य समाज को उसकी आबादी के अनुसार नहीं दिया। बल्कि यह कहा कि वैश्य समाज के कुल गुरु महाराज अग्रसेन ने एक ईंट और एक रुपए का सिद्घांत दिया, जिसका अनुसरण प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं। केंद्र सरकार सभी का विकास सभी का प्रयास सिद्घांत पर चल रही है। यहीं बात जी टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा ने भी कही। उन्होंने कहा कि वैश्य समाज केवल भामाशाहों का ही समाज नहीं है, बल्कि कई उपजातियां भी वैश्य समाज का ही हिस्सा है। मण्हंत नारायण गिरी ने भी वैश्य समाज के लोगों के उदार दिल की चर्चा की। उन्होंने कहा कि वैश्य समाज ने कभी किसी से नहीं मांगा, बल्कि सभी को दिया है। लक्ष्मीपुत्र मांगने का नाम नहीं है। सेठ भागमल ने दिल्ली के गौरीशंकर मंदिर को बचाने के लिए अपना सारा धन दे दिया। सेठ धर्मपाल गर्ग ने दूधेश्वरनाथ मंदिर को भव्य बनाने के लिए दूसरों से धन लेने से मना कर दिया।
कुछ इसी तरह की बात दूसरे नेताओं ने भी की। हालांकि कुछ ऐसे नेताओं ने मंच से राजनीतिक भागेदारी बढ़ाने के लिए दलों पर दबाव बनाने की बात कही। अग्रवाल महासभा के अध्यक्ष डॉ. अशोक अग्रवाल ने कहा कि वैश्य समाज के प्रत्याशी को जिताना है, चाहे वह किसी भी पार्टी से ही क्यों ना हो। कुछ वक्ताओं ने कहा कि वैश्य समाज कब तक सिर्फ कोषाध्यक्ष बने रहेंगे। किसी भी पार्टी के अध्यक्ष क्यों नहीं बन सकते हैं। वैश्य समाज सिर्फ चंदा देगा और सत्ता का सुख दूसरे समाज के लोग लेंगे, ऐसा कब तक चलेगा।