गाजियाबाद लोकसभा सीट
२००९ से गाजियाबाद लोकसभा चुनाव में वीवीआईपी सीट मानी जाती थी। २००९ में राजनाथ सिंह गाजियाबाद से सांसद बने थे। उससे पहले डॉ. रमेशचंद तोमर चार बार सांसद रहे। २०१४ में भी ये सीट जनरल वीके सिंह के आने से वीवीआईपी रही और २०१९ में भी वीवीआईपी रही। हालांकि इसी बीच स्थानीय और बाहरी का भी मुद्दा हमेशा हावी रहा। इस बार भाजपा हाईकमान ने स्थानीय नेता को टिकट देकर २००९ से पहले की तस्वीर फिर दोहरा दी। लेकिन गाजियाबाद सीट वीवीआईपी होने की वजह से हमेशा हर चुनाव में सुर्खियों में रही। अब स्थानीय नेता को टिकट दिये जाने के बाद भाजपा हाईकमान यहां की सीट पर खास फोकस कर रही है। जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तीन दिन पहले आये थे। कल उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या गाजियाबाद आये थे। कल ३ अप्रैल को भाजपा प्रत्याशी अतुल गर्ग के नामांकन में देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह आ रहे हैं। छह अप्रैल को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गाजियाबाद में रोड शो कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गाजियाबाद में अतुल गर्ग के समर्थन में दो कार्यक्रम करेंगे। वहीं सूत्रों पर भरोसा करें तो देश के गृहमंत्री अमित शाह भी गाजियाबाद में आ सकते हैं। मतलब साफ है कि गाजियाबाद सीट पर वीवीआईपी आगमन से ये संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है। गाजियाबाद आज भी सबसे अलग सीट है। वहीं दो बार के सांसद रहे जनरल वीके सिंह को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है। ये भी स्वस्थ राजनीति के अच्छा संकेत नहीं है। मुख्यमंत्री का आगमन हो या फिर नामांकन हो किसी भी कार्यक्रम की जानकारी वीके सिंह को नहीं दी जा रही है। इतना ही नहीं चार बार के सांसद रहे डॉ. रमेशचंद तोमर को भी एक तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है। संचालन समिति में उन्हें कोई जगह नहीं दी गई है। जबकि रमेशचंद तोमर चार बार सांसद रहे और आज भी उनका हर समाज, हर वर्ग और हर धर्म में अपना एक अलग स्थान है। आम कार्यकर्ता उनसे पूरी से तरह से जुड़ा हुआ है। तीसरी आंख ने देखा कि जनरल वीके सिंह का कहीं कोई भी जिक्र किसी भी कार्यक्रम में नहीं दिया जा रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री ने प्रबुद्घ सम्मेलन में जरूर वीके सिंह का नाम लेकर उनकी चर्चा की थी। राजनीति में टिकट मिलना और टिकट कटना अलग बात है लेकिन सबको साथ लेकर चलना भी एक अच्छा प्रयास माना जाता है। यदि नामांकन में जनरल वीके सिंह भी होते तो बहुत अच्छा संदेश जाता। लेकिन वीके सिंह और दूसरे लोगों में इस तरह दूरियां हो गई हैं कि ना ही उनका चित्र है और ना कोई उनका जिक्र है। जबकि राजनीति में सबकुछ चलता रहता है। इतनी मजबूत गांठ नहीं बांधी जाये जो कभी खुल ही ना पाये और फिर सामना हो तो फिर दुआ-सलाम भी ना हो। इस शेर के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं-
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
जय हिंद