मुख्यमंत्री के सामने हंगामा
मुख्यमंत्री के सामने गाजियाबाद में जो कुछ हुआ उसका संदेश सही नहीं गया। मुख्यमंत्री से मिलने को लेकर हंगामा करने वाले इस बात से नाराज हैं कि उनका वरिष्ठ होने के बाद भी अपमान किया गया। लेकिन सवाल ये भी पैदा होता है कि कम से कम वरिष्ठों को भी अपनी वरिष्ठता का ख्याल रखना चाहिए था। यदि ये हंगामा कोई और कार्यकर्ता करते तो अब तक अनुशासनहीनता की कार्रवाई हाईकमान से हो जाती। बड़ा सवाल ये पैदा होता है कि किसी भी नेता का कार्यक्रम मुख्यमंत्री से मिलने से था ही नहीं तो फिर महानगर अध्यक्ष संजीव शर्मा और अन्य लोग कैसे मुख्यमंत्री से मिल लिये इसको लेकर वरिष्ठों की नाराजगी है। प्रशासनिक सूत्रों ने बताया कि किसी नेता के मिलने का कार्यक्रम था ही नहीं। जो सूची जारी की गई और जिसमें नाम थे वो केवल प्रस्थान के समय ही मौजूद रहने के लिए उनसे कहा गया था। अब कोई चाय के पैसे वापस कर रहा है कोई वरिष्ठों के अपमान की बात कर रहा है। लेकिन ये कोई भी ये कहने को तैयार नहीं है कि मुख्यमंत्री की सुरक्षा ही सबसे अहम है। यदि मुख्यमंत्री से मिलने का कार्यक्रम पहले से तय होता और उसके बाद प्रशासन उन्हें नहीं मिलने देता तब शिकायत जायज थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था और उसके बाद जिस तरह की राजनीति हो रही है आम कार्यकर्ताओं में इसका सही संदेश नहीं जा रहा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि ये हम करते तो अब तक हमारे खिलाफ अनुशासन नहीं निभाने की ्रकार्यवाही हो जाती। जिन बड़े नेताओं ने हंगामा किया उसमें कई ऐसे नाम हैं जिनको नाम से मुख्यमंत्री जानते हैं। यदि उन्हें मिलना था तो पहले से समय ले लेते। लेकिन किसी को मिलना ही नहीं था जब 11 लोगों के फोटो अखबारों में छपे तब इन नेताओ को भी लगा उन्हें जानबूझकर इग्नोर किया गया और उन्होंने सीधा-सीधा संगठन पर आरोप लगाया। भाजपा के पूर्व विधायक का कहना है कि आखिरकार हंगामा करने वाले इन नेताओं को कौन सी ऐसी इमरजेंसी मुद्दे पर मुख्यमंत्री से मुलाकात करनी थी जो नहीं होने पर ये सब बिगड़ गये। उनका कहना है कि केवल अखबारों में फोटो तक ही इनकी राजनीति है और बेवजह आम कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जा रहा है इसलिए वरिष्ठों को भी अपनी वरिष्ठता का ख्याल रखना चाहिए। जय हिंद