विशेष संवाददाता
गाजियाबाद (युग करवट)। एक अजीब चर्चा आजकल हो रही है, जहां भी जाओ, जिससे भी मिलें वो एक ही चर्चा करता है कि आजकल तो मंत्रियों से बड़े उनके पीए या उनके निजी सचिव हो गए हैं। ये मालूम करते हैं कि भाई किस मंत्री जी के पीए यानी निजी सचिव या प्रतिनिधि बड़े हो गए हैं वो कौन हैं और किस मंत्री जी की चर्चा कर रहे हो तो नाम खुलकर बताने की हिम्मत किसी में नहीं हो रही है, बस जुबां पर सभी के है। मंत्रियों के पीए यानी निजी सचिवो का तो हमेशा ही सरकार में जलवा रहा। इस सरकार में भी है। ये कोई नई बात नहीं है, लेकिन ये भी हकीकत है कि मंत्रियों की निजी सचिवो एवं प्रतिनिधियों ने फजीहत भी खूब कराई है। अभी हाल ही में समाप्त हुए विधानसभा चुनाव हो या फिर २०१९ का लोकसभा चुनाव हो।
कहीं ना कहीं उम्मीदवारों को अपने प्रतिनिधियों की वजह से काफी सवालों का सामना भी करना पड़ा और फजीहत भी उनकी हुई। मंत्रियों के निजी सचिवों को कोई आसानी से झेल नहीं पाता है। भले ही वो जो कुछ करते हों उसमें अंदरखाने मंत्रियों की ही भूमिका हो, लेकिन निशाने पर बेचारे निजी सचिव या प्रतिनिधि ही होते हैं। यहां भी कई निजी सचिवों को लेकर खूब चर्चाएं हैं। कोई कहता है कि वो संगठन से भी बड़े हैं, कोई कहता है कि वो मंत्री से भी बड़े हैं, कोई कहता है कि जो निजी सचिव या प्रतिनिधि कहेगा वही होगा। इतना ही नहीं और ना जाने क्या-क्या कहा जाता है, लेकिन अगर पर्दे के पीछे की हकीकत को समझ जाएंगे तो शायद उनकी राय निजी सचिवो, पीए यानी प्रतिनिधियों के बारे में बदल जाएगी। क्योंकि मंत्री प्रतिनिधियों की उतनी ही सुनते हैं जितनी उनको अपने पक्ष में सही लगती है।
बहरहाल कौन मंत्री है, किस मंत्री का निजी सचिव मंत्री से भी बड़ा हो गया, ये बता नहीं पा रहा है। भले ही दर्द सभी को उस प्रतिनिधि से हो, लेकिन डायरेक्ट कोई पंगा लेना भी नहीं चाह रहा है। एक बात तो जरूर साफ लग रही है कि निजी सचिव का जलवा तो वास्तव में मंत्री जी से ज्यादा है, क्योंकि लोग मंत्रियों के सामने उनकी शिकायत कर देते हैं, उनसे नाराजगी व्यक्त कर देते हैं, मगर जिस भी मंत्री जी के निजी सचिव की चर्चा हो रही है उसका नाम पीछे लेने की भी किसी के अंदर हिम्मत नहीं है, इसलिए बात में जरूर कुछ दम है।