विशेषज्ञों की मानें तो पैनिक फैलाने का किया जा रहा है काम
दो सौ तरह के होते हैं फंगस
युग करवट संवाददाता
गाजियाबाद। ब्लैक फंगस के बाद व्हाइट और अब देश मेेंं पहला येलो फंगस का मामला सामने के बाद सवाल उठने शुरू हो गए हैं। येलो फंगस का पहला मामला गाजियाबाद के एक निजी अस्पताल में सामने आया है जहां के ईएनटी सर्जन डॉ.बीपी त्यागी ने इस फंगस को खतरनाक बताते हुए दावा किया है कि यह फंगस रेप्टाइल जैसे जीवों में पाया जाता है जो पहली बार इंसान में पाया गया है। हालांकि, इस दावे के बाद अन्य ईएनटी विशेषज्ञों ने इस पर सवाल उठाते हुए निशाना साधा है और कहा कि इस तरह के कोई फंगस खतरनाक नहीं होते और अगर दावे में सच्चाई है, तो लैब से प्रमाणित रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए ताकि अगर ऐसा है तो इसके इलाज को लेकर गंभीरता बरती जा सके। ईएनटी विशेषज्ञों ने इस मामले को पूरी तरह से बकवास करार देते हुए पैनिक फैलाने वाला बताया है।
वरिष्ठ ईएनटी सर्जन डॉ.आनंद प्रकाश गुप्ता ने युग करवट से हुई बातचीत में येलो फंगस का मरीज मिलने के दावे को कोरी बकवास करार दिया है। उन्होंने कहा कि इस तरह का कोई फंगस नहीं होता है। जिस समय मरीज की जांच की गई होगी, उस समय उसके गले या नाक में कफ जमा होगा जिसकी वजह से नाक में जमा फंगस येलो कलर का दिख रहा होगा। डॉ.गुप्ता ने कहा कि येलो फंगस होताही नहीें। सिर्फ व्हाइट और ग्रे कलर का फंगस होता है लेकिन वह भी आसानी से क्योर हो जाता है। ऐसे में अगर कोई अन्य कलर के फंगस का दावा कर रहा है तो वह सिर्फ जनता में पैनिक फैलाने का काम रहा है जबकि फंगस का इलाज आसान होता है। डॉ.गुप्ता ने कहा कि उनकी ओपीडी में अभी तक इस तरह का कोई मामला सामने नहीं आया है। फंगस के मामले पूर्व में भी आते रहे हैं, ऐसे में जनता इससे डरे नहीं। वहीं ईएनटी सर्जन डॉ.नवनीत वर्मा ने बताया कि मेडिकल में अगर कहा जाए तो फंगस का एक माइकोलॉजी विंग होता है जिसमें दो सौ प्रकार की फंगस होती हैं और हर फंगस का अलग-अलग रंग होता है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हर फंगस खतरनाक होती है। ब्लैक फंगस जरूर गंभीर मामला है क्योंकि यह बॉडी के टिश्यू तक पहुंच रही है। इसे लेकर सर्तक होने की आवश्यकता है। डॉ.वर्मा ने व्हाइट फंगस को लेकर कहा है कि जिन लोगों के मुंह में सफेदी आती है या फिर वह पफ लेते हैं,उनमें यह बीमारी आम देखती जाती है। येलो फंगस को लेकर उन्होंने कहा कि जांच करने वाली दुरबीन के लैंस कलरफुल होते हैं।
जांच के दौरान हर कलर में अलग-अलग हिस्से को देखा जाता है, संभवता जांच के दौरान फंगस का कलर लैंस के कलर में येलो दिखाई दिया होगा। लेकिन अगर येलो फंगस को लेकर दावा किया जा रहा है तो उसकी कल्चर रिपोर्ट कराई जाए ताकि अगर ऐसा कोई इंफेक्शन किसी मरीज में मिला है तो उसकी जांच गंभीरता से कराई जाए। डॉ.वर्मा ने कहा कि फंगस का इलाज आसान है, इसकी सफाई से भी यह ठीक हो जाता है। ऐसे में अलग-अलग रंग के फंगस के दावे कर जनता को भयभीत करने का कार्य ना किया जाए। बता दें कि देश में पहला येलो फंगस का मामला सामने आने के बाद स्थानीय स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया। तो वहीं येलो फंगस को लेकर दावा करने वाले डॉक्टर पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। सूत्रों की मानें तो ईएनटी विशेषज्ञों ने इसे पूरी तरह से पैनिक फैलाने वाला और लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा करने वाला करार दिया है।