भारतीय जनता पार्टी अपने आप में सबसे ऊपर खुद को समझ रही थी और उसको लग रहा था कि उसके सामने या उसके अंदर मुकाबले की किसी में हिम्मत नहीं है, लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य के झटके ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सबको हिला दिया। तीन दिन के अंदर भाजपा के ८ विधायकों का इस्तीफा हो गया। आज सुबह स्वामी प्रसाद मौर्य के खास फिरोजाबाद की शिकोहाबाद सीट से भाजपा विधायक मुकेश वर्मा ने भी भाजपा को बाय-बाय कह दिया। कल तक सहयोगी दलों को अहमियत नहीं देने वाली भाजपा ने कल देर रात तक सहयोगी दलों के साथ लंबी बातचीत की। अपना दल की अनुप्रिया पटेल की नाराजगी दूर करते हुए भाजपा उन्हें २५ में से १४ सीटें देने को तैयार हो गई है। वहीं संजय निषाद भी अब ३० सीटों पर अड़ गए हैं, लेकिन संभवत: १७ सीटों पर बात बन सकती है। यदि स्वामी प्रसाद मौर्य बगावती तेवर नहीं दिखाते तो शायद दिल्ली वाले सहयोगी दलों को इतना भाव नहीं देते, लेकिन अभी भी स्थिति साफ नहीं है और कई नेता अभी भी भाजपा को बाय-बाय कहने की तैयारी कर रहे हैं। दरअसल साढ़े चार साल में सहयोगी दलों को बिल्कुल भी भाव नहीं दिया गया। अगर ये कहा जाए कि भाजपा के विधायकों और मंत्रियों को भी कोई अहमियत नहीं दी गई तो कोई गलत नहीं होगा। ३१२ सीटों के प्रचण्ड बहुमत के नशे में हाईकमान ये भूल गया था कि २०२२ में भी चुनाव होना है। साढ़े चार से अधिक समय तक जिस तरह सहयोगी दलों ने उपेक्षा झेली अब जवाब देने का समय उनके पास है। राजनीतिक गलियारों में हो रही चर्चाओं पर भरोसा करें तो भाजपा सांसद रीता बहुगुणा जोशी भी अब अपने बेटे मयंक के लिए लखनऊ की कैंट सीट से टिकट मांग रही है। यदि टिकट नहीं मिलता है तो उनकी नाराजगी कहां तक जायेगी ये भी देखने वाली बात होगी। वहीं भाजपा के तीन और मंत्री ऐसे हैं जो अपने परिवार के लिए टिकट चाहते हैं। यदि उनको एड्जस्ट नहीं किया तो फिर भी कुछ फैसला ले सकते हैं, लेकिन इस बीच स्वामी प्रसाद मौर्य के रुख से जहां सहयोगी दलों की अहमियत बढ़ी है तो वहीं भाजपा जिन विधायकों के टिकट काटना चाहती थी उनको भी संभवत: अब टिकट मिल सकता है। बहरहाल किसी ने सही कहा है कि आज की राजनीति में सब कुछ संभव है।
– जय हिन्द।