कोई अगर ये समझ ले कि वो अपनी मर्जी से सरकार बना सकता है, तो ये उसकी गलतफहमी है। क्योंकि, जिस तरह से तस्वीरें सामने आ रही हैं उससे यही लग रहा है कि ना जाने चलती हुई सरकारें कब अल्पमत में आ जाएं। ये बात सही है कि केंद्र में जिसका दबदबा होगा, वही प्रदेश में भी जब चाहे परिवर्तन कर सकता है।  महाराष्ट्र का उदाहरण सबके सामने हैं। हालांकि,  महाराष्ट्र  में कांगे्रस, एनसीपी और शिवसेना की सरकार बनने के बाद से ही इसे बेमेल गठबंधन कहा जाता था और किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कांग्रेस के साथ मिलकर शिवसेना सरकार बना लेगी, लेकिन ऐसा हो गया था। मगर पहले दिन से ही सरकार को घेरने की पूरी कोशिश हो रही थी।  महाराष्ट्र सरकार के मंत्रियों की घेराबंदी हुई मतलब किसी भी तरह से सरकार कमजोर हो जाए क्योंकि, शिवसेना का  महाराष्ट्र में अपना एक अलग दबदबा है। इसलिए देर ही सही मिशन बदलाव कामयाब हो गया और घर के भेदी ने ही लंका ढहाने में अहम भूमिका निभाई। दरअसल भाजपा हाईकमान बहुत ही सावधानी के साथ अपने काम को अंजाम देता है। ये कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि जब लोग सत्ता के नशे में खो जाते हैं, तब भाजपा हाईकमान उन्हें जोर का झटका धीरे से देता है। मध्यप्रदेश के बाद भी विपक्ष भाजपा हाईकमान की नीति को नहीं समझ पाया था। हालांकि राजस्थान में भी कोशिश हुई लेकिन, वहां सचिन पायलट की वजह से भाजपा कामयाब नहीं हुई और आज भी कांग्रेस की सरकार जैसे भी चल रही है, लेकिन चल रही है।  महाराष्ट्र में शिवसेना के ही विधायक ने पूरा खेल बिगाड़ दिया और आज वहां के मुख्यमंत्री को अपना सरकारी बंगला छोडऩा पड़ा।  महाराष्ट्र के प्रकरण के बाद अब जहां भी गैर भाजपाई सरकारे हैं, उनमें हडक़ंप है और होना भी चाहिए। पता नहीं कब मंत्री से संत्री बन जाएं? बहरहाल बदलती राजनीति में अब कुछ भी संभव है। रात में कुछ, सुबह में कुछ कब बदल जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। सिद्घांत और उसूलों की राजनीति अब गुजरे जमाने की बात हो गई है। अब कहीं भी किसी भी दल में समर्पण की भावना वाली राजनीति नहीं हो रही है।
– जय हिन्द।