युग करवट संवाददाता
गाजियाबाद। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है। पार्टी को इस भंवर से निकालने के लिए मजबूत बाजुओं की जरूरत है, ना कि झुके हुए कंधों की। पार्टी के नेतृत्व की बागडोर संभालने वाला भी ऐसा होना चाहिए जिसमें निर्णय लेने की क्षमता हो, स्थानीय जनता की समस्याओं को लेकर जो प्रशासन से दो-दो हाथ कर सके। शहर के बीच में कांग्रेस की मौजूदगी का एहसास करा सके। जिसके दमखम को देखकर आम जनता का जुड़ाव कांग्रेस से हो सके। स्थानीय स्तर की बात करें तो ऐसा सहज भाव से कहा जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी का संगठन जनता से सीधा जुड़ाव करने में हर मोर्चे पर फेल साबित हुआ है। कांग्रेस से जुड़े लोग भी अब कहने लगे हैं कि वर्तमान महानगर अध्यक्ष से तो पूर्व अध्यक्ष की अच्छा था।
आने वाला समय कांग्रेस के महानगर संगठन को अपनी कसौटी पर कसने वाला है। निकाय चुनाव में शहर के 100 वार्डों पर कांग्रेस पार्टी की परीक्षा होगी। महानगर कांग्रेस कमेटी के सामने ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती शहर के सभी 100 वार्डों में अपने कैंडिडेट चुनाव मैदान में उतारने की होगी। चुनाव में कितने पार्षद जीतकर निगम के सदन में पहुंचेंगे इसका हिसाब भी आने वाला वक्त लेगा। महानगर कांग्रेस कमेटी की बात की जाए तो यहां की जिम्मेदारी हमेशा मजबूत कंधों पर रही है। बेशक, तजुर्बेकार लोगों ने महानगर कांग्रेस कमेटी संभाली, लेकिन कभी पद की गरिमा को गिरने नहीं दिया। कमेटी में हमेशा सम्मानित लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई, ना कि घोषित अपराधियों और शराब माफियाओं को। महानगर कांग्रेस कमेटी का नेतृत्व लाला बालकिशन, पंडित अमृत लाल शर्मा, सरदार गुलाब सिंह, कार्यवाहक अध्यक्ष एलएन स्वामी, स्वतंत्र यादव, पंडित सुरेन्द्र कुमार मुन्नी, बिजेन्द्र यादव, ओमप्रकाश शर्मा, वीके अग्निहोत्री, फिर ओमप्रकाश शर्मा, नरेन्द्र भारद्वाज और उसके बाद मनोज कौशिक के हाथों में रहा। वर्ममान में लोकेश चौधरी महानगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हैं। युवा अध्यक्ष मनोज कौशिक को प्रियंका गांधी ने खुद इंट्रव्यू लेने के बाद महानगर अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी थी। विधानसभा चुनाव के परिणाम को दरकिनार भी कर दिया जाए तो स्थानीय स्तर पर दमखम दिखाने में भी महानगर कांग्रेस कमेटी कमजोर साबित हुई है। वर्तमान अध्यक्ष की ताजपोशी हुए लगभग एक साल का समय बीत चुका है। पार्टी हाईकमान से मिले निर्देश की बात छोड़ दी जाए तो शायद ही महानगर कमेटी की ओर से स्थानीय समस्याओं को लेकर कोई धरना या प्रदर्शन प्रशासन या निगम के खिलाफ किया गया हो। जनता से जुड़ाव खत्म होने कारण महानगर कांग्रेस कमेटी कार्यालय पर लगने वाला कांग्रेसियों का जमघट भी खत्म हो चुका है। महानगर कांग्रेस कमेटी पर कार्यकर्ता कम और ताला ज्यादातर समय लटका दिखाई पड़ता है।
इससे पूर्व की बात की जाए तो मनोज कौशिक अनुभव में कच्चे थे, लेकिन उनके जमाने में संगठन के साथ युवाओं का जुड़ाव देखने को मिल रहा था। कांग्रेसी पूरी ताकत के साथ स्थानीय समस्याओं को भी उठा रहे थे। कोरोना संक्रमण की पहली और दूसरी लहर के दौरान कांग्रेसियों ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए ‘साझी रसोई’ भी चलाई थी। समस्याओं को लेकर कांग्रेसियों के उग्र प्रदर्शन की चर्चाएं अखबारों में सुर्खिया बटोर रही थीं। मनोज कौशिक के जाने के बाद महानगर कांग्रेस कमेटी पूरी तरह से शिथिल पड़ चुकी है। महानगर संगठन को लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं है। लोग कहने लगे हैं कि वर्तमान अध्यक्ष से तो मनोज कौशिक ही अच्छा था।
पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया था कंपनी बाग!
गाजियाबाद। कंपनी बाग खुद में अपना ऐतिहासिक महत्व रखता है। इसी कंपनी बाग में स्थित महानगर कांग्रेस कमेटी का कार्यालय अंग्रजों की बनाई इमारत से संचालित हो रहा है। मनोज कौशिक के कार्यकाल में कंपनी बाग स्थानीय पुलिस के लिए भी सिरदर्द बना हुआ था। महानगर कांग्रेस कमेटी तमाम समस्याओं को लेकर प्रदर्शन करने की घोषणा करती तो पुलिस के माथे पर शिकन पड़ जाती थीं। पुलिस कांगे्रसियों को हिरासत में लेने के लिए आए दिन कंपनी बाग का घेराव करती नजर आती थी। कभी-कभी तो स्थानी खुफीया विभाग के अधिकारी कांग्रेसियों की जानकारी निकालने कंपनी बाग में सुराग लगाते नजर आते थे। इसके बावजूद भी कांग्रेसी पुलिस को छकाकर अपना घोषित कार्यक्रम कर ही डालते थे। यूं कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि मनोज कौशिक के कार्यकाल में कंपनी बाग पुलिस के लिए सिरदर्द साबित हो रहा था।